आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआल्हाका विवाह । १३७ २१ गा नैपाली निज मंदिर को लश्कर खुशी बनाफरराय ८४ ऊदन बोले फिर मलखे ते दादा मोहबेके सरदार ॥ कूच करावो अब लश्कर को चलिकै लड़ैं तासुके द्वार ८५ यह मन भाई मलखाने के तुरतै कूच दीन करवाय ॥ कोउ कोउ घोड़ा हंसचाल पर कोउकोउ मोरचालपरजायँ ८६ चित्रचालपर चतुरचालपर कोईकोईचलैं तितुरकी चाल ॥ मारु मारु कै मौहरि बाजैं बाजैं हाव हाव करनाल ८७ बाजैं डंका अहतंका के घूमत जावैं लाल निशान ॥ छाय अँधेरिया गै दशहू दिशि छिपिगे अंधकार में भान ८८ मारु मारु करि क्षत्री बोलैं रणमें बड़े लड़ैता ज्वान ॥ घोड़ी कबुतरी के ऊपर माँ आगे चला बीर मलखान ८६ तीनकोस जब फाटक रहिगा तब पुरबासी उठे डेराय ॥ यक हरिकारा दौरति आवै राजै खबरि सुनाई आय ६० सुनिकै बातें हरिकाराकी राजा मनै उठा अकुलाय ॥ जोगा भोगा तहँ बैठेथे बोले राजै शीश नवाय ६१ हुकुम जो पावैं महाराजा को डंका अबै देयँ बजवाय ॥ जाय न पावैं मोहबे वाले सबकी कटा लेयँ करवाय ६२ सुनिकै बातें ये लरिकन की राजै हुकुम दीन फर्माय ॥ जोगा भोगा दोऊ चलिभे लश्कर तुरत पहुंचे आय ६३ बाजे डंका अहतंका के शङ्का करे कोऊ नहिं काल ॥ घोड़ आपनेपर चढ़िबैट्ठ्यो पूरन पटना को नरपाल ६४ जोगा भोगा घोड़े बैठे लश्कर कूच दीन करवाय ॥ बाजे डंका अहतंका के पहुँचे समरभूमि में आय ६५ आगे घोड़ाहै जोगा का पाछे सकल शूर मरदार ॥