आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
आल्हाका विवाह । १३७ २१ गा नैपाली निज मंदिर को लश्कर खुशी बनाफरराय ८४ ऊदन बोले फिर मलखे ते दादा मोहबेके सरदार ॥ कूच करावो अब लश्कर को चलिकै लड़ैं तासुके द्वार ८५ यह मन भाई मलखाने के तुरतै कूच दीन करवाय ॥ कोउ कोउ घोड़ा हंसचाल पर कोउकोउ मोरचालपरजायँ ८६ चित्रचालपर चतुरचालपर कोईकोईचलैं तितुरकी चाल ॥ मारु मारु कै मौहरि बाजैं बाजैं हाव हाव करनाल ८७ बाजैं डंका अहतंका के घूमत जावैं लाल निशान ॥ छाय अँधेरिया गै दशहू दिशि छिपिगे अंधकार में भान ८८ मारु मारु करि क्षत्री बोलैं रणमें बड़े लड़ैता ज्वान ॥ घोड़ी कबुतरी के ऊपर माँ आगे चला बीर मलखान ८६ तीनकोस जब फाटक रहिगा तब पुरबासी उठे डेराय ॥ यक हरिकारा दौरति आवै राजै खबरि सुनाई आय ६० सुनिकै बातें हरिकाराकी राजा मनै उठा अकुलाय ॥ जोगा भोगा तहँ बैठेथे बोले राजै शीश नवाय ६१ हुकुम जो पावैं महाराजा को डंका अबै देयँ बजवाय ॥ जाय न पावैं मोहबे वाले सबकी कटा लेयँ करवाय ६२ सुनिकै बातें ये लरिकन की राजै हुकुम दीन फर्माय ॥ जोगा भोगा दोऊ चलिभे लश्कर तुरत पहुंचे आय ६३ बाजे डंका अहतंका के शङ्का करे कोऊ नहिं काल ॥ घोड़ आपनेपर चढ़िबैट्ठ्यो पूरन पटना को नरपाल ६४ जोगा भोगा घोड़े बैठे लश्कर कूच दीन करवाय ॥ बाजे डंका अहतंका के पहुँचे समरभूमि में आय ६५ आगे घोड़ाहै जोगा का पाछे सकल शूर मरदार ॥
२२ आल्हखण्ड । १३८ घोड़ बेंदुला पर ऊदनहैं लीन्हे हाथ ढाल तलवार ९६ जोगा बोला तब घोड़ेते कौने डांड़ दबायो आय ॥ जितने आये हैं मोहवे के सबके मूड़ लेउँ कटवाय ९७ बातें सुनिकै ये जोगा की ऊदन तहां पहुंचे आय ॥ हमहैं क्षत्री मुहवे वाले हमरो मूडलेउ कटवाय ९८ सुनिकै बातें जोगा ठाकुर तुरतै खैंचिलीन तलवार ॥ ऐंचिकै मारा बघऊदन को सोऊ लीन ढालपर वार ९६ भोगा चलिभा तब ऊदनपर मलखे तुरत पहुंचे आय ॥ मलखेठाकुर के मूर्चा में कोउ राजपूत न रोकै पायँ १०० मन्नागूजर मोहवे वाला पूरन पटना का सरदार ॥ लड़ें बहादुर दोउ रणखेतन दोऊहाथ करैं तलवार १०१ घोड़ पपीहा की पीठिपर रूपन गरुदेय ललकार ॥ भाला छूटे असवारन के पैदलचलनलागितलवार १०२ गजके हौदा ते शर वर्षे नीचे करैं महावत मार ॥ कझा भिड़िगे तहँ घोड़न के अंकुशभिड़ेमहौतनक्यार १०३ पैदर के सँग पैदर भिड़िगे घोड़न साथ घोड़ असवार ॥ सूंदि लपेटा हाथी भिड़िगे हौदन होय तीर की मार १०४ चलैं कटारी कोनाखानी ऊना चलैं विलाइति केर ॥ लीन्हे भाला नागदवनि को मारैं एक एक को हेर १०५ झुके सिपाही नैनागढ़ के ऐंड़ा बेंड हनैं तलवार ॥ जोगा भोगा दोनों ठाकुर गरूई हाँक दीनललकार १०६ सदा न फूलै यह बन तोरई यारों सदा न सावन होय ॥ अम्मर देही नहिं मानुष कै मरिहै एकदिना सबकोय १०७ है मरदाना ज्यहि को बाना सो लड़ि मरै समर मैदान ॥
आल्हाका बियाह । १३६ २३ जीवत बचिहै जो मुर्च्चा ते पाई खान पान सनमान १०८ जो भगिजाई अब मुर्च्चा ते तेहिको हनों कठिन तलवार ॥ जोगा भोगा की बातें सुनि झूमनलागि शूर सरदार १०९ कटि कटि कल्ला गिरैं बखेड़ा मरि मरि होनलागखरिहान ॥ धरि धरि धमकैं रण खेतन में क्षत्री बड़े लड़ैता ज्वान ११० मूड़न केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार ॥ मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्तकी धार १११ सवैया ॥ कौन शुमार करै ललिते अतिमार भई सो कहाँ लगगाई । खून कि धार बहे नदि नार किनार परैं गज ऊंट दिखाई ॥ नाच पिशाच करैं तहँ साँच लिये करखप्पर योगिनि आई ॥ गावत भूत बजावत ताल तहाँ करतालनकी धुनिछाई ११२ ऊदन बोले मलखाने ते दादा मोहबे के सरदार ॥ कठिन मवासी है नैनागढ़ ह्वाँपर बहुत रहौ हुशियार ११३ मन्नागूजर मोहबे वाले ज़ावो एक तरफ यहिबार ॥ चाचा मालिक सब तुम्हीं हौ राजा बनरस के सरदार ११४ तुम चलिजावो एक तरफको मारो ढूंढि ढूंढि कै ज्वान ॥ हाथिन केरे तुम हौदापर दादा हनो बीर मलखान ११५ इतना कहिकै बघऊदन ने हौदा उपर नचावा घोड़ ॥ काहू मारा तलवारी सों काहू हना तड़ाका गोड़ ११६ बाइस हौदा खाली ह्वैगै अकसर ऊदन के मैदान ॥ घोड़ी कबुतरी के ऊपरते बहुतन हना बीरमलखान ११७ जैसी जावै बनरसवाला आल्हा समर धनी तलवार ॥
२४ आल्हखण्ड । १४० भगैं सिपाही चौगिर्दा ते भारी होत चलै गलियार ११८ मन्नागूजर ऊजर कीन्हों देवै कठिन कीन तलवार ॥ को गति बरणै तहँ रुपनाकी रणमाँ भली मचाई मार ११९ पूरन राजा पटनावाला भाला लिये हनै दश पांच ॥ को गति बरणै तहँ भोगाकै घोड़ा ऊपर रहा सो नाच १२० हनि हनि मारै चौगिर्दा ते गरुई हाँक देय 'ललकार ॥ इतना सुनिकै मलखे ठाकुर तुरतै खैंचिलीन तलवार १२१ ऊदन बोले तब मलखे ते दादा मोहबे के सरदार ॥ सुनवाँ भौजी का भैया है आई मड़ये के त्यवहार १२२ इतना सुनिकै मलखे ठाकुर फ़ौजन तरफ पहूंचाय ॥ बहुतन मार्यो तलवारी सों बहुतनहन्यो ढालके घाय१२३ इतना कहिकै ऊदन चलिभे जोगा पास पहूंचे जाय ॥ जोगा बोला तब ऊदनते मानो कही बनाफरराय १२४ बड़ी दूरिते चलिआयो है आपनि लोह दिखावो आय ॥ सुनिकै बातें ऊदन बोले ठाकुर सत्य देयँ बतलाय १२५ मोरे मोहोबे में किरिया भै जो करि डरी चँदेलोराय ॥ कोऊ आवै समरभूमि में आपनिलोह दिखावैआय १२६ पहिले ल्वाहै वहिकी देखो पाछे आपनि देवदिखाय ॥ मारो मारो समर भूमि में नहिंशककरोमनैकछुभाय१२७ इतना सुनिकै जोगाठाकुर तुरतै लीन्ह्यो साँ ग उठाय ॥ मनाएक के सो अंदाजन ऊदन ऊपर दयोचलाय १२८ घोड़बेंदुला ऊपर उड़िगा नीचे सांगगिरी अरराय ॥ बचा बेंदुलाका चढ़वैया आल्हाकेर लघुरवाभाय १२६ ऊदन बोले फिरि जोगा ते दूसरि वार करो सरदार ॥
आल्हाका विवाह । १४१ २५ सुनिके बातें ये ऊदनकी तुरतै खैंचिलीन तलवार १३० ऐंचिकै मारा बघऊदनको ऊदन लीन ढाल परवार ॥ ऊदन बोल्यो फिरि जोगाते तिसरि वार करो सरदार १३१ खैंचि तड़ाका धनुही लीन्ह्यो तामें दीन्ह्यो तीर लगाय ॥ ऐंचिकै मारा सो ऊदनके ऊदनलीन्ह्यो वार बचाय १३२ खैंचि झड़ाका तलवारीको तुरतै हना उदयसिंहराय ॥ मूड़ बिसानी सो घोड़ेके बिन शिर परै रुंड दिखराय १३३ कोतल घोड़ा जोगा बैठे सायंकाल पहुंचा आय ॥ मारुबन्दभै दोनों दलमाँ फौजै चलीं थलनको धाय १३४ चरि चरि गौवैं घरका डगरीं उड़ि उड़ि पक्षिन लीन बसेर ॥ तारागण सब चमकनलागे संतन रमा रामको टेर १३५ करों तरंग यहाँ सों पूरण तव पद सुमिरि भवानीकन्त ॥ शमरमा मिलि दर्शन देवो इच्छा यही मोरि भगवन्त १३६ इति श्रीलखनऊनिवासि ( सी, आई, ई ) मुंशी नवलकिशोरात्मजवाबूप्रयागना- रायणजीकीआज्ञानुसारउन्नामप्रदेशान्तर्गतपँड़रीकलांनिवासिमिश्र वंशोद्भवबुधकृपाशङ्करसूनुपण्डितललिताप्रसादकृतऊदनविजय वर्णनोनामद्वितीयस्तरंगः २ ॥
सवैया ॥ शेष महेश गणेश मनाय, सदा वरदान यही हम पावैं । हाथगहे धनुबान सुजान, महान सदा ज्यहि वेद बतावैं ॥ कोटिन जन्म जहां उपजैं, रघुनन्दनके ढिगही तहँ आवैं । वरदान यही ललितेकर जान,सुजान सदा रघुनन्दन भावैं १
२६ - आल्हाखण्ड । १४२ सुमिरन ॥ गोपी घूमैं नहिं गलियनमें नहिंकहुँ नचत फिरतहैं श्याम॥ मानुष देही यह रहिहैना इकलो रही जगत में नाम १ नहीं भरोसा नर देहीको कैसे करै झूठ अभिमान ॥ सदा इकेलो तर बिरवाके मनमें करै रामको ध्यान २ यहै सहाई है दुनिया में गाई बेद पुराणन गाथ ॥ ताते ज्वानो खूब यह समझो गुजरो फेरि न आवै हाथ ३ समय जो पावो कछु दुनियामें ध्यावो सदा राम रघुराज ॥ विगरी सुधरै तुरतै तुम्हरी पूरण होयँ तुम्होरे काज ४ छूटि सुमिरनी गै देवनकै शाका सुनो शूरमन क्यार ॥ सुन्दरवन को चिट्ठी जाई लड़ि हैं बड़े बड़े सरदार ५ अथ कथाप्रसंग ॥ उदय दिवाकर भे पूरब में किरणनकीन जगतउजियार ॥ जोगा भोगा त्यहि समया में आये तुरत राज दरबार १ हाथ जोरिकै जोगा बोले बप्पा वचन करो परमान ॥ पाँचलाख फौजै हम लैगे रहिगे तीनिलाख सब ज्वान २ सुनिकै बातें ये जोगा की राजै कागज़ लीन उठाय ॥ चिट्ठी लिखिकै अरिनन्दन को सुन्दरवन को दीन पठाय ३ पाती लैके हरिकारा गो सुन्दर वनै पहुंचा जाय ॥ पढ़िकै पाती अरिनन्दन ने गौरीनन्दन चरण मनाय ४ तुरत बुलायो सेनापति को तासों कह्यो हाल समुझाय ॥ जितनी सेना सुन्दरवन की सबियाँ कूच देव करवाय ५ । सुनिकै बातें महराजा की कूचक डङ्का दीन बजाय ॥ कूच कराये सुन्दरवन ते नदी निकट पहुँचे आय ६
आल्हाका विवाह । १४३ २७ तम्बू गड़िगे महराजन के डेरा गड़े सिपाहिन केर ॥ आल्हा ऊदन के डेरे ते योजन एक कोस के नेर ७ किश्ती नावै तिहि नदिया में तामें नचैं कंचनी नाच ॥ आल्हा पकरै के कारण में ज्ञानिन युक्ति कीन यह साँच ८ दिखैं तमाशा तहँ नदिया में इत उत दोऊ दिशाके ज्वान ॥ आल्हा ठाकुर त्यहि समया में तहँ पर करै गये असनान ६ होनी होवै सो सच होवै ज्ञानी ध्यानी को दिखलाय ॥ कौन गुमानी अरमानी अस जानी मौत नहीं ज्यहिभाय १० फिरि अभिमानी नर देही के नेही चरणशरण नहिंजायँ ॥ बिना पियारे रघुनन्दन के चन्दन कौन परै दिखराय ११ बन्दन करिकै रघुनन्दन कों आल्हा नदी अन्हाने जाय ॥ चन्दन अक्षत सों पूजन करि प्रातःकृत्य कीन हर्षाय १२ मेला दीख्यो फिरि नदिया में दोउदिशि रहे नारि नर हेर ॥ नावै किश्तिन के ऊपर में होवै नाच पतुरियन केर १३ दिखै तमाशा तहँ ठाढ़े भे ठाकुर मोहबे के सरदार ॥ नावै आई अरिनन्दन की तिनमाँ होवै अधिक बहार १४ तहँ हरिकारा नैनागढ़ को बोला अरिनन्दन सों बात ॥ नामी ठाकुर मोहबे वाले आये आल्हा क्यरी बरात १५ सुनिकै बातें हरिकारा की बोल्यो अरिनन्दन त्यहिकाल ॥ रहे सगाई देशराज सों आल्हा बड़े पियारे बाल १६ अयो बराते का तिनके हौ पैदल नाच दिखौ महिपाल ॥ सुनिकै बातें अरिनन्दन की बोले देशराज के लाल १७ कौनि सगाई देशराज सों साँचे हाल देव बतलाय ॥ सुनिकै बातें ये आल्हा की कहअरिनन्दनबचन सुनाय १८
२८ आल्हाखण्ड । १४४ तुम चढ़िआवो अब नावन में देखो नाच यहाँ पर आय ॥ कहैं सगाई हम साँची फिरि तुम सों हाल देयें बतलाय १६ सुनिकै बातैं आल्हाठाकुर नावन उपर पहुंचे जाय ॥ किह्यो इशारा अरिनन्दन ने खेवट दीन्ह्यो नाव चलाय २० डाटिकै बोल्यो आल्हाठाकुर खेई नाव अबै ना जाय ॥ सुनिकैबोल्यो अरिनन्दन फिरि आल्है बार बार समुझाय २१ सोला मिनटन के अर्सा में आवो फेरि यहां पर भाय ॥ लहरा नदिया के तानन में बानन सरिस पहुँचैं जायँ २२ सो मन भावै महराजन के जे शिरताजन के समुदाय ॥ लहरा नदिया के तानन सों बानन सरिस पैरैं दिखराय २३ इतना कहतै अरिनन्दन के पहुंची नाव किनारे आय ॥ उतरी उतरा भा नावनते आल्हा उतरि परे हर्षाय २४ तम्बूलैंगे अरिनन्दन तब बन्दन कैकै शीश नवाय ॥ द्यावलि नन्दन तहँ बैठतभे चन्दन सरिस पैरैं दिखराय २५ कही हकीकति अरिनन्दनतब तुमको कैद कीन हम आय ॥ देखें हम सों बुद्धिमान कोउ मोहवे और पैरै दिखराय २६ इतना कहिकै अरिनन्दन ने तुरतै कूच दीन करवाय ॥ चढ़िकै हाथी आल्हाठाकुर सुन्दरबनै पहुंचे जाय २७ गा हरिकारा नैनागढ़ का राजै खबरि सुनाई जाय ॥ ऊदन ढूँढ़ैं ह्याँ आल्हा को दादा नहीं पैरै दिखराय २८ आज्ञा लैके मलखाने की सोनवाँ पास पहुंचे जाय ॥ भेद बनायो सब सोनवाँ ने फौजन फेरि पहुंचे आय २९ घोड़ा लैके बयपारी बनि सुन्दरबनै पहुंचे जाय ॥ द्वार पहुंचे अरिनन्दन के ऊदन बेंदुल दीन नचाय ३०
आल्हाका विवाह । १४५ २६' देखि तमाशा द्वारपाल तहँ ऊदन निकट पहुंचे आय ॥ साथ तुम्हारे द्वै घोड़ा हैं औ असवार एक तुम भाय ३१ रूप तुम्हारो बयपारी को आयो कौन देश ते भाय ॥ घोड़ा लायेते काबुलते बेचे सबै कन्नौजै जाय ३२' एक इकेलो यह बाकी है राजै खबरि सुनावै जाय ॥ इतना सुनिकै द्वारपाल फिरि राजै दीन्ह्यो खबरि बताय ३३ खबरि पायकै अरिनन्दन फिरि द्वारे पौरि पहुंचे आय ॥ घोड़ पपीहा मोहबेवाला राजा देखिगये हरषाय ३४ राजा बोले बघऊदन ते याकी कीमति देवबताय ॥ ऊदन बोले अरिनन्दनते साँचे बचन देयँ बतलाय ३५ पहिले चढ़िकै यहि घोड़ेपर कोऊ ज्वान नचावै आय ॥ हाल देखिल्यो यहि घोड़ेका तब मैं कीमति देउँ बताय ३६' सुनिकै बातें सौदागरकी राजै हुकुम दीन फर्माय ॥ बैठै क्षत्री जो कोउ जावै घोड़ा टापन देय हटाय ३७ होय मोहबिया कोउ मोहबेका घोड़ा देखि सीध है जाय ॥ टेढ़े घोड़ेके चढ़वैया मोहबे बसैं बनाफरराय ३८ सुनिकै बातें सौदागरकी तुरतै आल्है लीन बुलाय ॥ हुकुम लगायो अरिनन्दनने घोड़ा बैठि नचावोभाय ३६' हुकुम पायकै अरिनन्दनको घोड़ा चढ़े बनाफरराय ॥ घोड़ नचायो भल आल्हाने ऊदन बोल्यो बचन सुनाय ४०' जल्दी चलिये अब लश्करको दादा काह रह्यो पछिताय ॥ नाम हमारो उदयसिंहहै ओ अरिनन्दन बात बनाय ४१ इतना कहिकै बघऊदनने आपन घोड़ दीन दौड़ाय ॥ आल्हौ चलिभे फिरिजल्दीसों लश्कर दोऊ पहुंचेभाय ४२' १०
२. द्वितीय भाग: आल्हा-ऊदल बाल्यकाल, इन्द्रजीत-मलखान पराक्रम व बावन युद्ध आरम्भ
३० आल्हखण्ड । १४६ मलखे बोले फिरि आल्हाते लश्कर कूच देव करवाय ॥ यह मन भाई तब आल्हा के डङ्का तुरत दीन बजवाय ४३ हाथी सजिगा पचशब्दा तब आल्हा तुरत भयो असवार ॥ हरनागर घोड़े के ऊपर भैने चढ़ा चँदेले क्यार ४४ घोड़ मनोहर देवा बैठा सिरगा बनरसका सरदार ॥ सोहैं कबूतरी पर मलखे भल ऊदन बेंदुलपर असवार ४५ मन्नागूजर रूपन बारी दोऊ बेगि भये तय्यार ॥ झीलमबखतर पहिरिसिपाहिन हाथम लई ढाल तलवार ४६ कूचके डङ्का बाजन लागे घूमन लागे लाल निशान ॥ घोड़ी कबूतरी के ऊपरमाँ आगे फिरैं बीर मलखान ४७ खर खर खर खर कै रथ दौरैं रब्बा चलैं पवनकी चाल ॥ मारु मारु कै मौहरि बाजै बाजै हाव हाव करनाल ४८ इतते लश्कर गा आल्हाका जोगा उतै पहूँचा आय ॥ बम्बके गोला छूटन लागे हाहाकारी शब्द सुनाय ४६ जौनै हाथी के गोला लागै मानों गिरा महल अरराय ॥ जौनै क्षत्री के गोला लागै साथै उड़ा चीलहअमजाय ५० जौनै बछेड़ा के गोला लागै धुनकन रुईसरिस उड़िजाय ॥ गोला लागै ज्यहि सँड़िया के सो मुहभरा गिरै अललाय ५१ जौनै बैलके गोला लागै तरवर पात ऐस गिरि जाय ॥ दुनो गोल आगे को बढ़िगे तोपन मारु बन्द है जाय ५२ मारु बँदूकै औ मालाकी बलकी कड़ाबीन की मार ॥ चलैं कटारी बूंदीवाली ऊना चलै विलाइत क्यार ५३ कटि कटि क्षत्री गिरैं खेतमें उठि उठि रुण्ड करैं तलवार ॥ मुण्डन केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार ५४
आल्हाका बिवाह । १४७ ३१ सूँड़ि लपेटा हाथी भिड़िगे ऊपर करैं महावत मार ॥ पैदर पैदर कै बरनी मै औ असवार साथ असवार ५५ जौने हौदा ऊदन ताकैं बेंबुल तहाँ पहुँचै जाय ॥ हनिकै मारैं असवारे को औ हौदा ते देयँ गिराय ५६ अकसर ऊदन के मारुन में काहू धरा धीर ना जाय ॥ पूरन राजा औ जगनाका परिगासमर बरोबरि आय ५७ मलखे जोगा का संगरहै भोगा बेंबुल का असवार ॥ बिजिया ठाकुर देवा ठाकुर दूनों खूब करैं तलवार ५८ अपने अपने सब मुर्चन में क्षत्री नेक न मानैं हार ॥ मलखे जोगा के मुर्चा में होवै कड़ाबीन की मार ५६ ऊदन भोगा के मुर्चा में कोताखानी चलै कटार ॥ बिजिया देवा के मुर्चा में दोऊ हाथ चलै तलवार ६० को गति बरणै जगनायक की पूरन पटना को सरदार ॥ मारु बरोबरि दोऊ करिकै गरुई हाँक देयँ ललकार ६१ बड़ी लड़ाई भै नैनागढ़ नदिया बही रक्त की धार ॥ बहीं लहासैं तहँ क्षत्रिनकी पक्षी मानों ख्यलें नेवार ६२ जाँघ औ बाहू रजपूतन की तामें गोह सरिस उतरायँ ॥ छुरी कटारी मछली मानों ढालैं कछुवा सम दिखरायँ ६३ घोड़ा हींसैं हाथी चिघरैं ठाढ़े ऊंट तहाँ अललायँ ॥ बड़ बड़ राजा उमरायन को रणमास्यारकागमिलिखायँ ६४ जोगा ठाकुर के मुर्चापर गरुई हांक दीन मलखान ॥ सँभरिकै बैठो अब घोड़ापर की अब लौटि जाव घरज्वान ६५ सुनिकै बातें मलखाने की तुरतै खैंचि लीन तलवार ॥ ऐंचिकै मारा मलखाने को मलखे लीन ढालपर वार ६६
३२ आल्हाखण्ड । १४८ ढाल फाटिगै गैंड़ावाली रणमाँ टूटि गिरी तलवार ॥ उतरि कबूतरी ते मलखाने तुरतै बाँधि लीन सरदार ६७ बंधन हैगा जब जोगाका भोगा लीन्ह्यो सांग उठाय ॥ ताकि कै मारा बघऊदन का ऊदन लीन्ह्यो वार बचाय ६८ ऊदन बोले फिरि भोगाते ओ बिसिआने बात बनाय ॥ वार दूसरी अब तुम मारै ठाकुर तोरि आहिराहिजाय ६९ बातें सुनिकै बघऊदन की भोगा भालालीन उठाय ॥ दूनों अँगुरिन भाला तौलै कालीनाग ऐस मन्नाय ७० तारा टूटै आसमानते तौ हिरगास भुईं ना जाय ॥ छूटिग भाला जो अँगुरिनते कम्मर मचा ठनाका आय ७१ बचा दुलरुआ द्यावलिवाला आला देशराज को लाल ॥ ढालकि औझड़ ऊदनमारा भोगा गिरा तहाँ ततकाल ७२ भोगा बँधिगा रणखेतन में विजिया बड़ा लड़ैया ज्वान ॥ अपने मोर्चा में सो हार्यो बांध्यो मैनपुरी चवहान ७३ पूरनराजा जगनायक का मोर्चापरा बरोबरि आय ॥ गुर्ज चलायो पूरन राजा जगना लीन्ह्यो वार बचाय ७४ ऐंड़ा मसक्यो हरनागरके हाथी उपर पहुंचा जाय ॥ खैंचिकै मारा तलवारी को हाथी सूँढ़गिरी अरराय ७५ गिरामहावत तब मस्तकते हाथी बैठिगयो त्यहि ठायँ ॥ बंधन कीन्ह्यो फिरि पूरन को जीतिक डंका दिह्यो बजाय ७६ भगे सिपाही नैनागढ़ के काहू धराधीर ना जाय ॥ बंधन हैगे चारिउ योधा एकते एक बली अधिकाय ७७ जहँना तम्बू रहे आल्हाका तहँना गये सकल सरदार ॥ माहिल बन्धन सबको दीख्यो घोड़ी तुरत भये असवार ७८
[Header] आल्हाका विवाह । १४६ ३३
जहाँ कचहरी नयपाली की माहिल पहुंचिगये त्यहिबार ॥ दीख्यो माहिलको नयपाली राजै बड़ाकीन सतकार ७९ माहिल बोले तब राजाते तुम सुनिलेउ बिसेनेराय ॥ तीनों लड़िका तुम्हरे बँधिगे चौथो पूरन लये बँधाय ८० सुनवाँ ब्याहीगय आल्हा को तौ रजपूती जाय नशाय ॥ पानी पीहै कोउ क्षत्री ना तुमको सत्य दीन बतलाय ८१ राजा बोले तब माहिलते ठाकुर उरई के सरदार ॥ काह कलङ्की देशराज भे सो तुम कथा कहौ यहिबार ८२ माहिल बोले नयपाली ते सुनिल्यो बचन मोर महराज ॥ चले शिकारै देशराज बन दूसर बच्छराज शिरताज ८३ देवलि बिरमा दूनों बहिनी बेंचिनदही जायँ त्यहिराह ॥ मार्ग सँकोचो त्यहि बनजानो अरनालड़ैं तहाँ नरनाह ८४ पकरिकै सींगैं इक भैंसाकी देवलि दीन्ह्यो दूरि हटाय ॥ दूसर बिरमाने पकरा तहँ पाछे सोऊ पछिलाति जाय ८५ दूनों अरना मारग हटिगे दूनों जोड़ भये इकठोर ॥ देशराज कह बच्छराज सों दूनों बड़ी बली इकजोर ८६ इनको लैकै घरको चलिये होवैं पूत सुपूते भाय ॥ तिनहिन अहिरिन के पेटेते चारो भये बनाफरराय ८७ बाप छत्तरी माता अहिरिनि बेटा कैसे होयँ कुलीन ॥ ब्याह न कीन्ह्यो तुमसुनवाँ का जानोंजातिपांति अकुलीन ८८ पूजन कीन्ह्यो तब माहिल का राजै फेरि कीन सतकार ॥ बड़े पियारे तुम माहिल हौ ठाकुर उरई के सरदार ८९ बहिनि बियाही चंदेले घर जिनको कही रजा परिमाल ॥ किह्योमुलहिजानहिंतिनकोतुम हमसों सत्य कह्यो सबहाल ९०
३४ आल्हाखण्ड। १५० युक्ति बनावो अब तुमहीं म्वहिं जासों धर्म रहै यहिकाल ॥ सुनवाँ ब्याही फिरि जावैना औ मरिजाएँ दुष्ट ततकाल ६१ सुनिकै बातें नयपाली की माहिल बोले वचन उदार ॥ बाना तजिकै रजपूती का अब धरि देव ढाल तलवार ६२ नाई वारी सँगमें लैके पाँयन परोजाय ततकाल ॥ जो कछु बोलैं सो कछु मान्यो मड़ये तरे लैआवौ हाल ६३ घरमें लैके चारो भाई मारो नृपति आय ततकाल ॥ इतना कहिकै माहिल चलिभे आदरकीन बहुत नरपाल ६४ भुजा उखारी गईं अभई की माहिल हृदय परी सो शाल ॥ लड़ै सिड़ैकी सखरि नाहीं निन्दाकरत फिरैं सबकाल ९५ जैसे राजै भानुप्रतापी मार्यो रहै तपस्वी ज्वान ॥ यह है गाथा बालकाण्ड में तुलसी राम समर मैदान ६६ तैसे ऊदनके मरिबेमें माहिल चुगुल बने सबद्वार ॥ धर्मसे निन्दा नहिं माहिलकी यामें दिहे शास्त्र अधिकार ६७ औरो गाथा कहु पुराणकी यामें आनि घटावों ज्वान ॥ पै नहिं समया यहि समया में ऐसी परी व्यवस्था आन ६८ माहिल पहुंचे फिरि तम्बूनमें राजै नेगी लीन बुलाय ॥ जहँना तम्बू रहै आल्हा का राजा तहाँ पहुँचे जाय ६६ बड़े प्यार सों राजै लीन्ह्यो आल्हा बैठिगये हर्षाय ॥ मलखे बोले तब राजाते आपन हालदेउ बतलाय १०० कौने मतलब को आयो है सो हम करैं चारिहू भाय ॥ सुनिकै बातें मलखाने की राजा बोले वचन बनाय १०१ हँसी खुशी सों सुनवाँ व्याहैं हमारे मनै गई यह आय ॥ सिंहन घर में कन्या ब्याही स्यारन हँसीकिये का भाय १०२
आल्हाका बिवाह । १५१ ३५ धन्य बखानों दुउ रानिनको जिनके पूत सुपूते चार ॥ धन्य बखानों मलखाने को माड़ो भलीकीन तलवार १०३ भुजा उखारयो ज्यहि अभईके आल्हाकेर लहुरवा भाय ॥ तीनों चलिये अब मड़ये को भौंरी तुरत देयँ करवाय १०४ इतना सुनिकै मलखे बोले फौजन डंका देउ बजाय ॥ कह नयपाली सुन मलखाने इकलो दूलह देउ पठाय १०५ कह मलखाने सुन नैपाली तुमसों सत्य देयँ बतलाय ॥ किरिया करलो श्रीगंगाकी ब्याहन तबै तुम्हारे जायँ १०६ यह मनभाई नयपाली के किरिया तुरत कीन सरदार ॥ तीनों लड़का मलखे छोड़े आपौ फाँदिभये असवार १०७ देवा ऊदन मन्नागूजर सय्यद बनरस का सरदार ॥ सजि जगनायक मोहबेवाला रूपन बारी भयो तयार १०८ आल्हा बैठे फिरि पलकी में मनमें श्रीगणेशंपद ध्याय ॥ सबियाँ चलिभे नैनागढ़ को महलन तुरत पहूँचे जाय १०६ खम्भा गड़िगा तहँ चन्दन का मालिन माड़ो कीन तयार ॥ सखियाँ आईं नयपाली घर गावन लगीं मंगलाचार ११० चढ़ो चढ़उवा जब सुनवाँ का फाटक बन्द लीन करवाय ॥ क्षत्री आये जे लड़ने को ते कोठेपर रखे छिपाय १११ भो गठिबन्धन जब आल्हा को थाल्हा गड़ा शूरमन क्यार ॥ प्रथमै पूज्यो श्रीगणेश को गौरीनन्दन शम्भु कुमार ११२ भाँवरि पहिली के परतैखन पण्डित कीन बेद उच्चार ॥ जोगा मारयो तलवारी को ऊदन लीन ढालपर वार ११३ भाँवरि दूसरिके परतैखन भोगा हनी तुरत तलवार ॥ मलखे ठाढ़े रहैं दहिने पर सो लै लई ढालपर वार ११४
३६ आल्हाखण्ड । १५२ भाँवरि तीसरि के परतैखन बिजिया मारी गुर्ज उठाय ॥ वार बचाई त्यहि देवाने राजा रंगमहल को जाय ११५ भाँवरि चौथी के परतैखन राजा जादू दीन चलाय ॥ जवाँ बन्द भै सब कुँवरन कै सबकी नजरबन्द है जाय ११६ सुनवाँ सोची अपने मनमाँ बैरी हैगा बाप हमार ॥ बीर महम्मद की पुरिया को सुनवाँछोड़िदीनत्यहिबार ११७ भई लड़ाई तहँ जादुनकी सातों भाँवरि लई कराय ॥ आल्हा वाली फिरि पलकी में तुरतै सुनवाँ लीन विठाय ११८ सवैया ॥ भूप दुवार चली तलवार अपार बही तहँ शोणित धारा। वीर बली मलखान सुजान तहाँ बहु क्षत्रिनको हनिडारा ॥ पूतजुझार महाहुशियार लड़ै तहँ भीषम केर कुमारा । कौनकहै बघऊदनको रिपुसूदनसों ललिते त्यहि बारा ११९ सुन्दरखन को अरिनन्दन जो सोऊ आयगयो त्यहि द्वार ॥ आठकोसलों चलै सिरोही नदिया बही रक्त की धार १२० आगे डोलाहै सुनवाँ को पीछे होय भड़ाभड़ मार ॥ ऊदनमलखे की मारुन में जूझे बड़े बड़े सरदार १२१ आल्हा बँधुवाभे नैनागढ़ जोगा झगा बँधे मलखान ॥ कूच करायो बघऊदन ने लश्कर मागराज नियरान१२२ ऊदन बोले तब सुनवाँ ते भौजी मानों कही हमार ॥ दादा बांधेगे नैनागढ़ कैसी युक्तिकरी यहिवार १२३ सुनिकै बातें बघऊदन की सुनवाँ युक्ति कही समुझाय ॥ सम्मत करिकै दूनों चलिभे नैनागढ़ै पहूंचे आय १२४ पुहपा मालिनि के घर बैठे सुनवाँ सहित लहुरवा भाय ॥
आल्हाका विवाह । १५३ ३७ सुनवाँ पूछ्यो जों मालिनि ते मालिनिखबरिदीनबतलाय १२५ रूप गुजरियाको सुनवाँ करि पहुंची नाह निकट सो जाय ॥ रूप देखिकै त्यहि गूजरिको मोहित भयो बनाफरराय १२६ जस बतलान्यो ये गूजरिसों गूजरि तैस दीन समुझाय ॥ मुंदरी दीन्ह्यो फिरि गूजरिको मालिनिघेरै पहुंची आय १२७ सब समुझायो फिरि ऊदन को सांचे हाल दीन बतलाय ॥ घोड़ करिलिया औ रसबेंदुल लैकै गयो लहुरवाभाय १२८ खबरि पायकै बयपारी कै द्वारे नृपति पहुंचा आय ॥ बनो कबुलिहा बघऊदन है सांचो आगा परै दिखाय १२६ राजा पूछ्यो बयपारी सों सांची कीमत देव बताय ॥ ऊदन बोल्यो नयपाली सों चढ़िकैदेखिलेयकोउआय १३० चाल देखिल्यो इन घोड़नकी पाछे कीमत देयँ बताय ॥ सुनिकै बातें ब्योपारी की राजै हुकुमदीन फर्माय १३१ जावैं क्षत्री जो घोड़न ढिग ताको टापन देयँ हटाय ॥ मुखसों काटैं ऊपर उलैरैं कोउरजपूतपास ना जाय १३२ देखि तमाशा यहु महाराजा तुरतै आल्हा लीन बुलाय ॥ घोड़ा फेरो तुम फाटक में इनकीचाल देव दिखराय १३३ किह्यो इशारा बघऊदन ने घोड़ा चढ़े बनाफरराय ॥ बैठ बेंदुलापर बघऊदन आपननामदीन बतलाय १३४ बाग उठायो दउ घोड़न की फाटक पार पहुंचे आय ॥ मालिनि घरते सुनवाँ चलिभै तुरतै पलकी लीन मँगाय १३५ तीनों पहुंचे फिरि लश्कर में डंका बजन लाग घहराय ॥ चलि भैं फौजैं मलखाने की पहुंचीं प्रागराज में आय १३६ जितने क्षत्री रहैं लश्कर में सबियाँ करनगये असनान ॥
३८ आल्हखण्ड । १५४ हनवन करिके तिरवेनीको दीन्ह्यो द्विजन दान सब ज्वान १३७ बृक्ष अक्षयबटको पूजन करि पहुंचे भरद्वाज अस्थान ॥ बेनीमाधो के दर्शन करि दीन्ह्यो द्विजन सुवरण दान १३८ हाथी घोड़ा रथ कपड़ा औ गहना दीन द्विजन बुलवाय ॥ भये अयाचक सब याचकगण जय जयरहे बनाफर राय १३६ बैठिकै गंगा के तट ऊपर क्षत्रिन हवन कीन हरषाय ॥ स्वाहा स्वाहा बहु द्विज बोलैं कहुँ २ स्वधा स्वधा गाळाय १४० स्वधा औ स्वाहा ते छुट्टी करि विप्रन भोजन दीन कराय ॥ भोजन करिकै सब द्विज तहँते अपने घरनगये सुखपाय १४१ कूच करायो फिरि मलखाने डंका बजत फौज में जाय ॥ देवलि बिरमा द्वारे ठाढ़ीं देखें वाट बनाफरराय १४२ राह निहारैं नित पुत्रन की कबधौं ऐहैं पुत्र हमार ॥ जौन मुसाफिर आवत देखें ताको करें बड़ा सत्कार १४३ हाल न पावैं जब पुत्रन को तब फिरि जावैं घरे निराश ॥ रानी मल्हना महलन ऊपर नितप्रतिकरैमिलनकी आश १४४ तबलों रुपना आगे आयो पाछे फौज पहुंची आय ॥ बड़ी खुशहाली भै मोहबे माँ दौरे सबै नारिनर धाय १४५ मल्हना देवलि बिरमा तीनों पलकी पास पहुँचीं जाय ॥ मियादेवन को पलकी गै पूजनकीन बहुरिया आय १४६ आल्हा मलखे देबा ऊदन अक्षत चन्दन फूल चढ़ाय ॥ मियादेवन की परिकरमा क्षत्रिन सबन कीन हर्षाय १४७ तहँते आये फिरि द्वारे को तुरतै पण्डितन लीन बुलाय ॥ आरति लैके फिरि सोने की तामें चौमुख दिया बराय १४८ चर परछौनी मल्हना कीन्ह्यो भीतर गये बनाफर राय ॥
आल्हाका बिवाह । १५५ . ३६ उतरिकै पलकी ते सुनवाँफिरि महलन तुरत पहुंचीजाय १४९ मुहँ दिखलाई रानी मल्हना गलको दीन नौलखाहार ॥ पायँ लागेकै सुनवाँ तहँपर करको कंकण दीन उतार १५० बाजन बाजे चौगिर्दा ते घर घर भये मंगलाचार ॥ फिरि परिमालिक की ड्योढ़ीमाँ पहुंचे सबै शूर सरदार १५१ राजा पूँछें मलखाने ते ओ बिरमा के राजकुमार ॥ अमरढोल रहे नयपाली के कैसे किह्यो तहाँपर मार १५२ इतना सुनिकै मलखे बोले तुम सुनिलेउ रजापरिमाल ॥ दया तुम्हारी जापर होवै ताकीबिजयहोयसबकाल १५३ हृदय लगायो सब कुँवरन को सबको कीन बड़ा सतकार ॥ जीतिके डंका बाजन लागे नौबति झौरै रजा के द्वार १५४ सौ सौ तोपें दर्गी सलामी चकरन पाई खूब इनाम ॥ पिता हमारे किरपाशंकर कीन्हेनिसबैद्विजनकेकाम १५५ माथ नवाबों पितु अपने को जिनबल पूरिकीन यह गाथ ॥ मोर सहायी जग एकै हैं स्वामी अवधनाथ रघुनाथ १५६ आशिर्वाद देउँ मुंशीसुत जीवो प्रागनारायण भाय ॥ सुखसों जीवो तुम दुनियामें दिनदिनहोउधनीअधिकाय १५७ रहे समुन्दर में जबलों जल जबलौं रहें चन्द औ सूर ॥ मालिक ललिते के तबलौंतुम यशसों रहौ सदाभरपूर १५८ इति श्रीलखनऊ निवासि ( सी, आई, ई ) मुंशी नवलकिशोरात्मज बाबू प्रयागनारायणजीकी आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलां निवासि मिश्रवंशोद्भवबुधकृपाशंकरसूनु पं०ललिताप्रसाद कृत आल्हापाणिग्रहणवर्णनोनाम तृतीयस्तरंगः ॥ ३ ॥ नैनागढ़आल्हाबिवाहसम्पूर्ण इति ॥
४० आल्हखण्ड । १५६
राखौ गति अद्भुत दर्शानी २ ॥ निशि दिन पापकर्मरत प्राणी सत्यासत्य भुलानी ॥ हत्यालाख धरत शिर ऊपर मोह बेदना ठानी ॥ १ ॥ नाती पूत शोच बश परकर आतमज्ञान हिरानी ॥ अहं अहं डहकत दरवाजे देखत नारि बिरानी ॥ २ ॥ अभिमानी नित देखत आंखिन मरतजात बहुप्रानी ॥ तवहूं तनक चेत मननाहीं रटै रामगुणखानी ॥ ३ ॥ हटै अकाल सुकाल बढ़ै जग नाशाय रोग निशानी ॥ सो नहिं होनहार हम देखत होयँ बहुतनरज्ञानी ॥४॥ अभिमानी लाखन हम देखत ज्ञानी दशहु न जानी ॥ होत प्रपंच साधु सन्तनमें पंचन नाहिं ठिकानी ॥ ५ ॥ तजि दुर्गा अर्चन नर पामर गति मुर्गाकी आनी ॥ लैहँड़िपुत्र पौत्र उपजावत अनशिक्षित अभिमानी॥६॥ तेइ मर्य्याद धर्मकी नाशत भाषत झूठ गुमानी ॥ मात पिताको मूरख कहिकै देवत कष्ट महानी ॥ ७ ॥ यह कलियुगकी देखि बड़ाई कहत ललित यहबानी ॥ राघौ राम और रघुनन्दन इन बन्दन दुखहानी ॥ ८ ॥ चलो मन जहाँ बसैं रघुराज । चलो मन जहाँ बसैं रघुराज ॥ यहि दुनिया में कौन हमारो हम क्याहिके क्याहिकाज ॥ देखत जो कछु रहत न सो कछु ढहत काल शिरताज ॥ १ ॥ गहत कौनके रहत कौन नर सोइ कहत हम आज ॥ रघुनन्दन जगवन्दन ज्यहि सुत त्यहि शिरपर दुखभ्राज ॥ २ ॥ सेयो यशोदा नन्द कृष्णको सोऊ न आये काज ॥ वैरिनि त्रिपाति सबहिं शिरऊपर देखिलेहु महराज ॥ ३ ॥ जो मन फैसे जगत के अन्दर बन्दरसम बिनलाज ॥ द्वारद्वार नट तिन्है नचावत ललित पेट के काज ॥ ४ ॥