आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६ - आल्हाखण्ड । १४२ सुमिरन ॥ गोपी घूमैं नहिं गलियनमें नहिंकहुँ नचत फिरतहैं श्याम॥ मानुष देही यह रहिहैना इकलो रही जगत में नाम १ नहीं भरोसा नर देहीको कैसे करै झूठ अभिमान ॥ सदा इकेलो तर बिरवाके मनमें करै रामको ध्यान २ यहै सहाई है दुनिया में गाई बेद पुराणन गाथ ॥ ताते ज्वानो खूब यह समझो गुजरो फेरि न आवै हाथ ३ समय जो पावो कछु दुनियामें ध्यावो सदा राम रघुराज ॥ विगरी सुधरै तुरतै तुम्हरी पूरण होयँ तुम्होरे काज ४ छूटि सुमिरनी गै देवनकै शाका सुनो शूरमन क्यार ॥ सुन्दरवन को चिट्ठी जाई लड़ि हैं बड़े बड़े सरदार ५ अथ कथाप्रसंग ॥ उदय दिवाकर भे पूरब में किरणनकीन जगतउजियार ॥ जोगा भोगा त्यहि समया में आये तुरत राज दरबार १ हाथ जोरिकै जोगा बोले बप्पा वचन करो परमान ॥ पाँचलाख फौजै हम लैगे रहिगे तीनिलाख सब ज्वान २ सुनिकै बातें ये जोगा की राजै कागज़ लीन उठाय ॥ चिट्ठी लिखिकै अरिनन्दन को सुन्दरवन को दीन पठाय ३ पाती लैके हरिकारा गो सुन्दर वनै पहुंचा जाय ॥ पढ़िकै पाती अरिनन्दन ने गौरीनन्दन चरण मनाय ४ तुरत बुलायो सेनापति को तासों कह्यो हाल समुझाय ॥ जितनी सेना सुन्दरवन की सबियाँ कूच देव करवाय ५ । सुनिकै बातें महराजा की कूचक डङ्का दीन बजाय ॥ कूच कराये सुन्दरवन ते नदी निकट पहुँचे आय ६