पृष्ठ 146आल्हाका विवाह । १४१ २५
सुनिके बातें ये ऊदनकी तुरतै खैंचिलीन तलवार १३०
ऐंचिकै मारा बघऊदनको ऊदन लीन ढाल परवार ॥
ऊदन बोल्यो फिरि जोगाते तिसरि वार करो सरदार १३१
खैंचि तड़ाका धनुही लीन्ह्यो तामें दीन्ह्यो तीर लगाय ॥
ऐंचिकै मारा सो ऊदनके ऊदनलीन्ह्यो वार बचाय १३२
खैंचि झड़ाका तलवारीको तुरतै हना उदयसिंहराय ॥
मूड़ बिसानी सो घोड़ेके बिन शिर परै रुंड दिखराय १३३
कोतल घोड़ा जोगा बैठे सायंकाल पहुंचा आय ॥
मारुबन्दभै दोनों दलमाँ फौजै चलीं थलनको धाय १३४
चरि चरि गौवैं घरका डगरीं उड़ि उड़ि पक्षिन लीन बसेर ॥
तारागण सब चमकनलागे संतन रमा रामको टेर १३५
करों तरंग यहाँ सों पूरण तव पद सुमिरि भवानीकन्त ॥
शमरमा मिलि दर्शन देवो इच्छा यही मोरि भगवन्त १३६
इति श्रीलखनऊनिवासि ( सी, आई, ई ) मुंशी नवलकिशोरात्मजवाबूप्रयागना-
रायणजीकीआज्ञानुसारउन्नामप्रदेशान्तर्गतपँड़रीकलांनिवासिमिश्र
वंशोद्भवबुधकृपाशङ्करसूनुपण्डितललिताप्रसादकृतऊदनविजय
वर्णनोनामद्वितीयस्तरंगः २ ॥
सवैया ॥
शेष महेश गणेश मनाय, सदा वरदान यही हम पावैं ।
हाथगहे धनुबान सुजान, महान सदा ज्यहि वेद बतावैं ॥
कोटिन जन्म जहां उपजैं, रघुनन्दनके ढिगही तहँ आवैं ।
वरदान यही ललितेकर जान,सुजान सदा रघुनन्दन भावैं १