भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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आल्हाका विवाह । १४१ २५ सुनिके बातें ये ऊदनकी तुरतै खैंचिलीन तलवार १३० ऐंचिकै मारा बघऊदनको ऊदन लीन ढाल परवार ॥ ऊदन बोल्यो फिरि जोगाते तिसरि वार करो सरदार १३१ खैंचि तड़ाका धनुही लीन्ह्यो तामें दीन्ह्यो तीर लगाय ॥ ऐंचिकै मारा सो ऊदनके ऊदनलीन्ह्यो वार बचाय १३२ खैंचि झड़ाका तलवारीको तुरतै हना उदयसिंहराय ॥ मूड़ बिसानी सो घोड़ेके बिन शिर परै रुंड दिखराय १३३ कोतल घोड़ा जोगा बैठे सायंकाल पहुंचा आय ॥ मारुबन्दभै दोनों दलमाँ फौजै चलीं थलनको धाय १३४ चरि चरि गौवैं घरका डगरीं उड़ि उड़ि पक्षिन लीन बसेर ॥ तारागण सब चमकनलागे संतन रमा रामको टेर १३५ करों तरंग यहाँ सों पूरण तव पद सुमिरि भवानीकन्त ॥ शमरमा मिलि दर्शन देवो इच्छा यही मोरि भगवन्त १३६ इति श्रीलखनऊनिवासि ( सी, आई, ई ) मुंशी नवलकिशोरात्मजवाबूप्रयागना- रायणजीकीआज्ञानुसारउन्नामप्रदेशान्तर्गतपँड़रीकलांनिवासिमिश्र वंशोद्भवबुधकृपाशङ्करसूनुपण्डितललिताप्रसादकृतऊदनविजय वर्णनोनामद्वितीयस्तरंगः २ ॥

सवैया ॥ शेष महेश गणेश मनाय, सदा वरदान यही हम पावैं । हाथगहे धनुबान सुजान, महान सदा ज्यहि वेद बतावैं ॥ कोटिन जन्म जहां उपजैं, रघुनन्दनके ढिगही तहँ आवैं । वरदान यही ललितेकर जान,सुजान सदा रघुनन्दन भावैं १