आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआल्हाका विवाह । १४३ २७ तम्बू गड़िगे महराजन के डेरा गड़े सिपाहिन केर ॥ आल्हा ऊदन के डेरे ते योजन एक कोस के नेर ७ किश्ती नावै तिहि नदिया में तामें नचैं कंचनी नाच ॥ आल्हा पकरै के कारण में ज्ञानिन युक्ति कीन यह साँच ८ दिखैं तमाशा तहँ नदिया में इत उत दोऊ दिशाके ज्वान ॥ आल्हा ठाकुर त्यहि समया में तहँ पर करै गये असनान ६ होनी होवै सो सच होवै ज्ञानी ध्यानी को दिखलाय ॥ कौन गुमानी अरमानी अस जानी मौत नहीं ज्यहिभाय १० फिरि अभिमानी नर देही के नेही चरणशरण नहिंजायँ ॥ बिना पियारे रघुनन्दन के चन्दन कौन परै दिखराय ११ बन्दन करिकै रघुनन्दन कों आल्हा नदी अन्हाने जाय ॥ चन्दन अक्षत सों पूजन करि प्रातःकृत्य कीन हर्षाय १२ मेला दीख्यो फिरि नदिया में दोउदिशि रहे नारि नर हेर ॥ नावै किश्तिन के ऊपर में होवै नाच पतुरियन केर १३ दिखै तमाशा तहँ ठाढ़े भे ठाकुर मोहबे के सरदार ॥ नावै आई अरिनन्दन की तिनमाँ होवै अधिक बहार १४ तहँ हरिकारा नैनागढ़ को बोला अरिनन्दन सों बात ॥ नामी ठाकुर मोहबे वाले आये आल्हा क्यरी बरात १५ सुनिकै बातें हरिकारा की बोल्यो अरिनन्दन त्यहिकाल ॥ रहे सगाई देशराज सों आल्हा बड़े पियारे बाल १६ अयो बराते का तिनके हौ पैदल नाच दिखौ महिपाल ॥ सुनिकै बातें अरिनन्दन की बोले देशराज के लाल १७ कौनि सगाई देशराज सों साँचे हाल देव बतलाय ॥ सुनिकै बातें ये आल्हा की कहअरिनन्दनबचन सुनाय १८