आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८ आल्हाखण्ड । १४४ तुम चढ़िआवो अब नावन में देखो नाच यहाँ पर आय ॥ कहैं सगाई हम साँची फिरि तुम सों हाल देयें बतलाय १६ सुनिकै बातैं आल्हाठाकुर नावन उपर पहुंचे जाय ॥ किह्यो इशारा अरिनन्दन ने खेवट दीन्ह्यो नाव चलाय २० डाटिकै बोल्यो आल्हाठाकुर खेई नाव अबै ना जाय ॥ सुनिकैबोल्यो अरिनन्दन फिरि आल्है बार बार समुझाय २१ सोला मिनटन के अर्सा में आवो फेरि यहां पर भाय ॥ लहरा नदिया के तानन में बानन सरिस पहुँचैं जायँ २२ सो मन भावै महराजन के जे शिरताजन के समुदाय ॥ लहरा नदिया के तानन सों बानन सरिस पैरैं दिखराय २३ इतना कहतै अरिनन्दन के पहुंची नाव किनारे आय ॥ उतरी उतरा भा नावनते आल्हा उतरि परे हर्षाय २४ तम्बूलैंगे अरिनन्दन तब बन्दन कैकै शीश नवाय ॥ द्यावलि नन्दन तहँ बैठतभे चन्दन सरिस पैरैं दिखराय २५ कही हकीकति अरिनन्दनतब तुमको कैद कीन हम आय ॥ देखें हम सों बुद्धिमान कोउ मोहवे और पैरै दिखराय २६ इतना कहिकै अरिनन्दन ने तुरतै कूच दीन करवाय ॥ चढ़िकै हाथी आल्हाठाकुर सुन्दरबनै पहुंचे जाय २७ गा हरिकारा नैनागढ़ का राजै खबरि सुनाई जाय ॥ ऊदन ढूँढ़ैं ह्याँ आल्हा को दादा नहीं पैरै दिखराय २८ आज्ञा लैके मलखाने की सोनवाँ पास पहुंचे जाय ॥ भेद बनायो सब सोनवाँ ने फौजन फेरि पहुंचे आय २९ घोड़ा लैके बयपारी बनि सुन्दरबनै पहुंचे जाय ॥ द्वार पहुंचे अरिनन्दन के ऊदन बेंदुल दीन नचाय ३०