आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
पृष्ठ 155, कुल 618 में से
संदर्भ में पढ़ें३४ आल्हाखण्ड। १५० युक्ति बनावो अब तुमहीं म्वहिं जासों धर्म रहै यहिकाल ॥ सुनवाँ ब्याही फिरि जावैना औ मरिजाएँ दुष्ट ततकाल ६१ सुनिकै बातें नयपाली की माहिल बोले वचन उदार ॥ बाना तजिकै रजपूती का अब धरि देव ढाल तलवार ६२ नाई वारी सँगमें लैके पाँयन परोजाय ततकाल ॥ जो कछु बोलैं सो कछु मान्यो मड़ये तरे लैआवौ हाल ६३ घरमें लैके चारो भाई मारो नृपति आय ततकाल ॥ इतना कहिकै माहिल चलिभे आदरकीन बहुत नरपाल ६४ भुजा उखारी गईं अभई की माहिल हृदय परी सो शाल ॥ लड़ै सिड़ैकी सखरि नाहीं निन्दाकरत फिरैं सबकाल ९५ जैसे राजै भानुप्रतापी मार्यो रहै तपस्वी ज्वान ॥ यह है गाथा बालकाण्ड में तुलसी राम समर मैदान ६६ तैसे ऊदनके मरिबेमें माहिल चुगुल बने सबद्वार ॥ धर्मसे निन्दा नहिं माहिलकी यामें दिहे शास्त्र अधिकार ६७ औरो गाथा कहु पुराणकी यामें आनि घटावों ज्वान ॥ पै नहिं समया यहि समया में ऐसी परी व्यवस्था आन ६८ माहिल पहुंचे फिरि तम्बूनमें राजै नेगी लीन बुलाय ॥ जहँना तम्बू रहै आल्हा का राजा तहाँ पहुँचे जाय ६६ बड़े प्यार सों राजै लीन्ह्यो आल्हा बैठिगये हर्षाय ॥ मलखे बोले तब राजाते आपन हालदेउ बतलाय १०० कौने मतलब को आयो है सो हम करैं चारिहू भाय ॥ सुनिकै बातें मलखाने की राजा बोले वचन बनाय १०१ हँसी खुशी सों सुनवाँ व्याहैं हमारे मनै गई यह आय ॥ सिंहन घर में कन्या ब्याही स्यारन हँसीकिये का भाय १०२