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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

३४ आल्हाखण्ड। १५० युक्ति बनावो अब तुमहीं म्वहिं जासों धर्म रहै यहिकाल ॥ सुनवाँ ब्याही फिरि जावैना औ मरिजाएँ दुष्ट ततकाल ६१ सुनिकै बातें नयपाली की माहिल बोले वचन उदार ॥ बाना तजिकै रजपूती का अब धरि देव ढाल तलवार ६२ नाई वारी सँगमें लैके पाँयन परोजाय ततकाल ॥ जो कछु बोलैं सो कछु मान्यो मड़ये तरे लैआवौ हाल ६३ घरमें लैके चारो भाई मारो नृपति आय ततकाल ॥ इतना कहिकै माहिल चलिभे आदरकीन बहुत नरपाल ६४ भुजा उखारी गईं अभई की माहिल हृदय परी सो शाल ॥ लड़ै सिड़ैकी सखरि नाहीं निन्दाकरत फिरैं सबकाल ९५ जैसे राजै भानुप्रतापी मार्यो रहै तपस्वी ज्वान ॥ यह है गाथा बालकाण्ड में तुलसी राम समर मैदान ६६ तैसे ऊदनके मरिबेमें माहिल चुगुल बने सबद्वार ॥ धर्मसे निन्दा नहिं माहिलकी यामें दिहे शास्त्र अधिकार ६७ औरो गाथा कहु पुराणकी यामें आनि घटावों ज्वान ॥ पै नहिं समया यहि समया में ऐसी परी व्यवस्था आन ६८ माहिल पहुंचे फिरि तम्बूनमें राजै नेगी लीन बुलाय ॥ जहँना तम्बू रहै आल्हा का राजा तहाँ पहुँचे जाय ६६ बड़े प्यार सों राजै लीन्ह्यो आल्हा बैठिगये हर्षाय ॥ मलखे बोले तब राजाते आपन हालदेउ बतलाय १०० कौने मतलब को आयो है सो हम करैं चारिहू भाय ॥ सुनिकै बातें मलखाने की राजा बोले वचन बनाय १०१ हँसी खुशी सों सुनवाँ व्याहैं हमारे मनै गई यह आय ॥ सिंहन घर में कन्या ब्याही स्यारन हँसीकिये का भाय १०२

आल्हाका बिवाह । १५१ ३५ धन्य बखानों दुउ रानिनको जिनके पूत सुपूते चार ॥ धन्य बखानों मलखाने को माड़ो भलीकीन तलवार १०३ भुजा उखारयो ज्यहि अभईके आल्हाकेर लहुरवा भाय ॥ तीनों चलिये अब मड़ये को भौंरी तुरत देयँ करवाय १०४ इतना सुनिकै मलखे बोले फौजन डंका देउ बजाय ॥ कह नयपाली सुन मलखाने इकलो दूलह देउ पठाय १०५ कह मलखाने सुन नैपाली तुमसों सत्य देयँ बतलाय ॥ किरिया करलो श्रीगंगाकी ब्याहन तबै तुम्हारे जायँ १०६ यह मनभाई नयपाली के किरिया तुरत कीन सरदार ॥ तीनों लड़का मलखे छोड़े आपौ फाँदिभये असवार १०७ देवा ऊदन मन्नागूजर सय्यद बनरस का सरदार ॥ सजि जगनायक मोहबेवाला रूपन बारी भयो तयार १०८ आल्हा बैठे फिरि पलकी में मनमें श्रीगणेशंपद ध्याय ॥ सबियाँ चलिभे नैनागढ़ को महलन तुरत पहूँचे जाय १०६ खम्भा गड़िगा तहँ चन्दन का मालिन माड़ो कीन तयार ॥ सखियाँ आईं नयपाली घर गावन लगीं मंगलाचार ११० चढ़ो चढ़उवा जब सुनवाँ का फाटक बन्द लीन करवाय ॥ क्षत्री आये जे लड़ने को ते कोठेपर रखे छिपाय १११ भो गठिबन्धन जब आल्हा को थाल्हा गड़ा शूरमन क्यार ॥ प्रथमै पूज्यो श्रीगणेश को गौरीनन्दन शम्भु कुमार ११२ भाँवरि पहिली के परतैखन पण्डित कीन बेद उच्चार ॥ जोगा मारयो तलवारी को ऊदन लीन ढालपर वार ११३ भाँवरि दूसरिके परतैखन भोगा हनी तुरत तलवार ॥ मलखे ठाढ़े रहैं दहिने पर सो लै लई ढालपर वार ११४

३६ आल्हाखण्ड । १५२ भाँवरि तीसरि के परतैखन बिजिया मारी गुर्ज उठाय ॥ वार बचाई त्यहि देवाने राजा रंगमहल को जाय ११५ भाँवरि चौथी के परतैखन राजा जादू दीन चलाय ॥ जवाँ बन्द भै सब कुँवरन कै सबकी नजरबन्द है जाय ११६ सुनवाँ सोची अपने मनमाँ बैरी हैगा बाप हमार ॥ बीर महम्मद की पुरिया को सुनवाँछोड़िदीनत्यहिबार ११७ भई लड़ाई तहँ जादुनकी सातों भाँवरि लई कराय ॥ आल्हा वाली फिरि पलकी में तुरतै सुनवाँ लीन विठाय ११८ सवैया ॥ भूप दुवार चली तलवार अपार बही तहँ शोणित धारा। वीर बली मलखान सुजान तहाँ बहु क्षत्रिनको हनिडारा ॥ पूतजुझार महाहुशियार लड़ै तहँ भीषम केर कुमारा । कौनकहै बघऊदनको रिपुसूदनसों ललिते त्यहि बारा ११९ सुन्दरखन को अरिनन्दन जो सोऊ आयगयो त्यहि द्वार ॥ आठकोसलों चलै सिरोही नदिया बही रक्त की धार १२० आगे डोलाहै सुनवाँ को पीछे होय भड़ाभड़ मार ॥ ऊदनमलखे की मारुन में जूझे बड़े बड़े सरदार १२१ आल्हा बँधुवाभे नैनागढ़ जोगा झगा बँधे मलखान ॥ कूच करायो बघऊदन ने लश्कर मागराज नियरान१२२ ऊदन बोले तब सुनवाँ ते भौजी मानों कही हमार ॥ दादा बांधेगे नैनागढ़ कैसी युक्तिकरी यहिवार १२३ सुनिकै बातें बघऊदन की सुनवाँ युक्ति कही समुझाय ॥ सम्मत करिकै दूनों चलिभे नैनागढ़ै पहूंचे आय १२४ पुहपा मालिनि के घर बैठे सुनवाँ सहित लहुरवा भाय ॥

आल्हाका विवाह । १५३ ३७ सुनवाँ पूछ्यो जों मालिनि ते मालिनिखबरिदीनबतलाय १२५ रूप गुजरियाको सुनवाँ करि पहुंची नाह निकट सो जाय ॥ रूप देखिकै त्यहि गूजरिको मोहित भयो बनाफरराय १२६ जस बतलान्यो ये गूजरिसों गूजरि तैस दीन समुझाय ॥ मुंदरी दीन्ह्यो फिरि गूजरिको मालिनिघेरै पहुंची आय १२७ सब समुझायो फिरि ऊदन को सांचे हाल दीन बतलाय ॥ घोड़ करिलिया औ रसबेंदुल लैकै गयो लहुरवाभाय १२८ खबरि पायकै बयपारी कै द्वारे नृपति पहुंचा आय ॥ बनो कबुलिहा बघऊदन है सांचो आगा परै दिखाय १२६ राजा पूछ्यो बयपारी सों सांची कीमत देव बताय ॥ ऊदन बोल्यो नयपाली सों चढ़िकैदेखिलेयकोउआय १३० चाल देखिल्यो इन घोड़नकी पाछे कीमत देयँ बताय ॥ सुनिकै बातें ब्योपारी की राजै हुकुमदीन फर्माय १३१ जावैं क्षत्री जो घोड़न ढिग ताको टापन देयँ हटाय ॥ मुखसों काटैं ऊपर उलैरैं कोउरजपूतपास ना जाय १३२ देखि तमाशा यहु महाराजा तुरतै आल्हा लीन बुलाय ॥ घोड़ा फेरो तुम फाटक में इनकीचाल देव दिखराय १३३ किह्यो इशारा बघऊदन ने घोड़ा चढ़े बनाफरराय ॥ बैठ बेंदुलापर बघऊदन आपननामदीन बतलाय १३४ बाग उठायो दउ घोड़न की फाटक पार पहुंचे आय ॥ मालिनि घरते सुनवाँ चलिभै तुरतै पलकी लीन मँगाय १३५ तीनों पहुंचे फिरि लश्कर में डंका बजन लाग घहराय ॥ चलि भैं फौजैं मलखाने की पहुंचीं प्रागराज में आय १३६ जितने क्षत्री रहैं लश्कर में सबियाँ करनगये असनान ॥

३८ आल्हखण्ड । १५४ हनवन करिके तिरवेनीको दीन्ह्यो द्विजन दान सब ज्वान १३७ बृक्ष अक्षयबटको पूजन करि पहुंचे भरद्वाज अस्थान ॥ बेनीमाधो के दर्शन करि दीन्ह्यो द्विजन सुवरण दान १३८ हाथी घोड़ा रथ कपड़ा औ गहना दीन द्विजन बुलवाय ॥ भये अयाचक सब याचकगण जय जयरहे बनाफर राय १३६ बैठिकै गंगा के तट ऊपर क्षत्रिन हवन कीन हरषाय ॥ स्वाहा स्वाहा बहु द्विज बोलैं कहुँ २ स्वधा स्वधा गाळाय १४० स्वधा औ स्वाहा ते छुट्टी करि विप्रन भोजन दीन कराय ॥ भोजन करिकै सब द्विज तहँते अपने घरनगये सुखपाय १४१ कूच करायो फिरि मलखाने डंका बजत फौज में जाय ॥ देवलि बिरमा द्वारे ठाढ़ीं देखें वाट बनाफरराय १४२ राह निहारैं नित पुत्रन की कबधौं ऐहैं पुत्र हमार ॥ जौन मुसाफिर आवत देखें ताको करें बड़ा सत्कार १४३ हाल न पावैं जब पुत्रन को तब फिरि जावैं घरे निराश ॥ रानी मल्हना महलन ऊपर नितप्रतिकरैमिलनकी आश १४४ तबलों रुपना आगे आयो पाछे फौज पहुंची आय ॥ बड़ी खुशहाली भै मोहबे माँ दौरे सबै नारिनर धाय १४५ मल्हना देवलि बिरमा तीनों पलकी पास पहुँचीं जाय ॥ मियादेवन को पलकी गै पूजनकीन बहुरिया आय १४६ आल्हा मलखे देबा ऊदन अक्षत चन्दन फूल चढ़ाय ॥ मियादेवन की परिकरमा क्षत्रिन सबन कीन हर्षाय १४७ तहँते आये फिरि द्वारे को तुरतै पण्डितन लीन बुलाय ॥ आरति लैके फिरि सोने की तामें चौमुख दिया बराय १४८ चर परछौनी मल्हना कीन्ह्यो भीतर गये बनाफर राय ॥

आल्हाका बिवाह । १५५ . ३६ उतरिकै पलकी ते सुनवाँफिरि महलन तुरत पहुंचीजाय १४९ मुहँ दिखलाई रानी मल्हना गलको दीन नौलखाहार ॥ पायँ लागेकै सुनवाँ तहँपर करको कंकण दीन उतार १५० बाजन बाजे चौगिर्दा ते घर घर भये मंगलाचार ॥ फिरि परिमालिक की ड्योढ़ीमाँ पहुंचे सबै शूर सरदार १५१ राजा पूँछें मलखाने ते ओ बिरमा के राजकुमार ॥ अमरढोल रहे नयपाली के कैसे किह्यो तहाँपर मार १५२ इतना सुनिकै मलखे बोले तुम सुनिलेउ रजापरिमाल ॥ दया तुम्हारी जापर होवै ताकीबिजयहोयसबकाल १५३ हृदय लगायो सब कुँवरन को सबको कीन बड़ा सतकार ॥ जीतिके डंका बाजन लागे नौबति झौरै रजा के द्वार १५४ सौ सौ तोपें दर्गी सलामी चकरन पाई खूब इनाम ॥ पिता हमारे किरपाशंकर कीन्हेनिसबैद्विजनकेकाम १५५ माथ नवाबों पितु अपने को जिनबल पूरिकीन यह गाथ ॥ मोर सहायी जग एकै हैं स्वामी अवधनाथ रघुनाथ १५६ आशिर्वाद देउँ मुंशीसुत जीवो प्रागनारायण भाय ॥ सुखसों जीवो तुम दुनियामें दिनदिनहोउधनीअधिकाय १५७ रहे समुन्दर में जबलों जल जबलौं रहें चन्द औ सूर ॥ मालिक ललिते के तबलौंतुम यशसों रहौ सदाभरपूर १५८ इति श्रीलखनऊ निवासि ( सी, आई, ई ) मुंशी नवलकिशोरात्मज बाबू प्रयागनारायणजीकी आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलां निवासि मिश्रवंशोद्भवबुधकृपाशंकरसूनु पं०ललिताप्रसाद कृत आल्हापाणिग्रहणवर्णनोनाम तृतीयस्तरंगः ॥ ३ ॥ नैनागढ़आल्हाबिवाहसम्पूर्ण इति ॥

४० आल्हखण्ड । १५६

राखौ गति अद्भुत दर्शानी २ ॥ निशि दिन पापकर्मरत प्राणी सत्यासत्य भुलानी ॥ हत्यालाख धरत शिर ऊपर मोह बेदना ठानी ॥ १ ॥ नाती पूत शोच बश परकर आतमज्ञान हिरानी ॥ अहं अहं डहकत दरवाजे देखत नारि बिरानी ॥ २ ॥ अभिमानी नित देखत आंखिन मरतजात बहुप्रानी ॥ तवहूं तनक चेत मननाहीं रटै रामगुणखानी ॥ ३ ॥ हटै अकाल सुकाल बढ़ै जग नाशाय रोग निशानी ॥ सो नहिं होनहार हम देखत होयँ बहुतनरज्ञानी ॥४॥ अभिमानी लाखन हम देखत ज्ञानी दशहु न जानी ॥ होत प्रपंच साधु सन्तनमें पंचन नाहिं ठिकानी ॥ ५ ॥ तजि दुर्गा अर्चन नर पामर गति मुर्गाकी आनी ॥ लैहँड़िपुत्र पौत्र उपजावत अनशिक्षित अभिमानी॥६॥ तेइ मर्य्याद धर्मकी नाशत भाषत झूठ गुमानी ॥ मात पिताको मूरख कहिकै देवत कष्ट महानी ॥ ७ ॥ यह कलियुगकी देखि बड़ाई कहत ललित यहबानी ॥ राघौ राम और रघुनन्दन इन बन्दन दुखहानी ॥ ८ ॥ चलो मन जहाँ बसैं रघुराज । चलो मन जहाँ बसैं रघुराज ॥ यहि दुनिया में कौन हमारो हम क्याहिके क्याहिकाज ॥ देखत जो कछु रहत न सो कछु ढहत काल शिरताज ॥ १ ॥ गहत कौनके रहत कौन नर सोइ कहत हम आज ॥ रघुनन्दन जगवन्दन ज्यहि सुत त्यहि शिरपर दुखभ्राज ॥ २ ॥ सेयो यशोदा नन्द कृष्णको सोऊ न आये काज ॥ वैरिनि त्रिपाति सबहिं शिरऊपर देखिलेहु महराज ॥ ३ ॥ जो मन फैसे जगत के अन्दर बन्दरसम बिनलाज ॥ द्वारद्वार नट तिन्है नचावत ललित पेट के काज ॥ ४ ॥

अथ आल्हखण्ड ॥ मलखानका बिवाह अथवा पथरी- गढ़की लड़ाई ॥ सवैया ॥ ध्यावत तोहिं सदा हनुमान यही बरदान मिलै मोहिं स्वामी । हाथ लिये धनुबान कृपान मिलैं भगवान जे अन्तरयामी ॥ टारे टरैं न कबों उरते तिन राम नमामि नमामि नमामि । जान यही ललिते बरदान सुनो हनुमान सदा सुखधामी १ सुमिरन ॥ तुलसी हुलसी अब दुनिया में झुलसी सकल नरनकीकावि ॥ घर घर पोथी रामायण की दर दर फिरैं बगल में दाबि १ गिरिगिरि चन्दन नहिं होवैंकहुँ बन बन नहीं रहैं गजराज ॥ नारि पतिव्रत नाहिं घर घर हैं थल थल नहीं होयँ कविराज २ ग्राहक होवैं नहिं दुनिया में तब गुण जावैं सबै हिराय ॥

२ आल्हाखण्ड । १५८ भोजन खावै हरिको ध्यावै साँचो ग्राहक दीन बताय ३ नाहक जग में कोउ पछतावै भावै नहीं दूसरो काज ॥ देही आपनि गलि गलि जावै आवै फेरि जगत में लाज ४ छूटि सुमिरनी गै ह्वाँते अब शाका सुनो शूरमन क्यार ॥ ब्याह बखानों मलखाने का लड़िहैं बड़े बड़े सरदार ५ अथ कथाप्रसंग ॥ यहु गजराजा पथरीगढ़ को ज्याहिको भरी लाग दरबार ॥ बैठक बैठे सब छत्री हैं एकते एक शूर सरदार १ सुवा पहाड़ी कहुँ पिंजरन में महलन नाचिरहे कहुँ मोर ॥ बैठि कबूतर कहुँ घुटकत हैं तीतर बोलिरहे कहुँ जोर २ घोड़ अगिनिया त्यहि राजाके साजा सबै विधाता काज ॥ है गजमोतिनि त्यहिकी बेटी विद्या रूप शील शिरताज ३ सो नित खेलै सँग सखियन में मेलै सदा गले में हाथ ॥ सेमा भगतिनि की चेली है गुटवा ख्यलै सखिन के साथ ४ खेलत खेलत कछु सखियों ने कीन्ही तहाँ ब्याह की बात ॥ कोउकोउ सखियाँ तहँ ब्याहीथीं जानैं भलो श्वशुरपुर नात ५ ब्याही बोलैं अनब्याहिन सों सखियो सुनो हमारी बात ॥ सुरपुर हरपुर हरिपुर नाहीं जो सुख मिलै श्वशुरपुरंरात ६ सुनि सुनि बातें ये ब्याहिनकी तहँ अनब्यहीमनै अकुलायँ ॥ फिरिफिरिपूँछैं तिन सखियनसों कासुखश्वशुरपुरैअधिकाय ७ बतियाँ घतियाँ जे बालम की छतियाँ छुवैं और अठिलायँ ॥ रतियाँ केरी सब बतियाँ को सखियाँ कहैं और हरपायँ ८ सुरपुर हरपुर हरिपुर नाहीं जो सुखश्वशुरपुरै अधिकाय ॥ सुनि सुनि बातें ये ब्याहिनकी मनमाँ गई बात ये छाय ६

मलखानका बिवाह । १५६ ३ सब अनब्याही ब्याकुल ह्वैकै घरका चलीं मनै पछिताय ॥ गै गजमोतिनि निज महलनमें सोई समय रातिको पाय १० जागे रोवन् शय्या लागी माता लीन्ह्यो हृदय लगाय ॥ काहे रोवत तुम बेटीहौ हमको हालदेउ बतलाय ११ दीख्यो सपना मैं माता है ब्याहे लिये कोऊ घरजाय ॥ मैं सुधि कीन्ह्यों तहँ बप्पाकी माता रोय उठिउँ अकुलाय १२ सुनिकै बातें ये बेटी की चंपा गोद लीन बैठाय ॥ चूम्यो चाट्यो गले लगायो बातनदियो ताहि बहलाय १३ अवसर पायो जब रानी ने राजा पास पहुंची जाय ॥ बेटी लायक है ब्याहन के टीका देउ आप पठवाय १४ समया आयो अब कलियुगका औ युगधर्म रहा दर्शाय ॥ बातें सुनिकै ये रानी की राजा नेगी लीन बुलाय १५ सूरज बेटा को बुलवायो तासों हाल कह्यो समुझाय ॥ दिल्ली कनउज चहु तहँ जायो जायो जहँ न चँदेलौराय १६ तीन लाख को टीका लैके सूरज कूच दीन करवाय ॥ आठ रोज की मैजलि करिकै पहुँच्च्यो जहाँ पिथौराँराय १७ को गति बरणै तहँ दिल्ली कै जहँपर रहै कौरवनराज ॥ जहँपर गर्जत दुर्योधनरहै जहँपर अये कृष्णमहराज १८ भीषम ऐसे जहँ योधा थे द्रोणाचार्य ऐस द्विजराज ॥ तहँपर गरजे शिरीकृष्णजी जयजयनमोनमो ब्रजराज १९ जब सुधि आवत है दिल्ली कै तब मन आय जात ब्रजराज ॥ सदा पियारे हैं विप्रन के अबहूं देत खानको नाज २० तहँपर पहुँचे सूरज ठाकुर चिट्ठी तुरत दीन पकराय ॥ आँक आँक सब पृथ्वी बांचा जो कुछ लिखा बिसेनेराय २१

४ आल्हखण्ड । १६० ब्याह बिसेने के करिवे ना टीका तुरत दीन लौटाय ॥ सूरज चलिभे तहँ दिल्ली ते • कनउज फेरि पहुंचे आय २२ हैं कनौजिया जहाँ बाम्हन बहु बड़ बड़ महल परैं दिखराय ॥ वेद पुराणन की चर्चा तहँ घरघरअधिक२ अधिकाय २३ सूरज पहुँचे जब ड्योढ़ी में बोला द्वारपाल शिरनाय ॥ कौने राजाके लड़िकाहौ राजै खबरि देयँ पहुँचाय २४ बातें सुनिकै द्वारपाल की सूरज हाल दीन समुझाय ॥ द्वारपाल सुनि गा राजा ढिग तुरतै खबरि सुनाई जाय २५ सुनिकै बातें दरवानी की राजै हुकुम दीन फरमाय ॥ द्वारपाल सूरज ढिग आयो लैके सभा पहुँचा जाय २६ चिट्ठी दीन्ह्यो तहँ सूरज ने जयचँद पढ़ा बहुत मनलाय ॥ क्यहिका लड़का घरभारू है पथरीगढ़ै बियाहन जाय २७ घोड़ अगिनिया जिनकेघरमाँ ज्यहिके मारे फौज बिलाय ॥ तुरतै टीकाको लौटारयो यहु महराज कनौजीराय २८ चलिभे सूरज तहँ कनउजे ते ठरई फेरि पहुंचे आय ॥ पांचकोस मोहबे के आगे मारै हिरन उदयसिंहराय २६ सूरज ऊदन यकमिल हैगे दूनों कीन्ह्यो रामजुहार ॥ ऊदन पूछैं तहँ सूरज ते ठाकुर पथरी के सरदार ३० टीको ऐसो का लै गमन्यो नेगी संग तुम्हारे चार ॥ सूरज बोलो तब ऊदन ते ठाकुर बेंदुलके असवार ३१ निकरे हनवन हम गङ्गा के साँचे हाल दीन बतलाय ॥ काह शिकारै तुम आयो है अकसर बनै उदयसिंहराय ३२ सुनिकै बातें ये सूरज की बोला तुरत बनाफरराय ॥ कियो बहाना तुम सूरज है नेगी संग लियेहौ भाय ३३

मलखानका विवाह । १६१ ५ हनवन केरी यह सामा ना झूंठी बात रह्यो बतलाय ॥ सूरज बोले फिरि ऊदन ते सांची सुनो बनाफरराय ३४ टीका लाये हम बहिनी का दिल्ली कनउज आये मँझाय ॥ टीका लीन्ह्यो क्यहु क्षत्री ना जावैं लौटि बनाफरराय ३५ इतना सुनिकै ऊदन बोले हमपर शारद भई सहाय ॥ दादा कोर मलखाने हैं टीका लिहे चलो तुम भाय ३६ सुफल तुम्हारी मेहनत होई हमरो काज सिद्ध है जाय ॥ सुनिकै बातें ये ऊदन की सूरज बोला बचन रिसाय ३७ नहीं आज्ञा महराजा की टीका नग्र मोहोबे जाय ॥ जाति बनाफर की हीनी है कीरति रही जगत में छाय ३८ सुनिकै बातें ये सूरज की बोला उदयसिंह सरदार ॥ नीके जैहौ तौ लैजैहौं नहिं यह देखिलेउ तलवार ३६ सुनिकै बातें ये ऊदन की नाई बारी उठे डेराय ॥ ते समुझावैं भल सूरजको मानो कही बिसेनेराय ४० रारि न करियो तुम ऊदनते नामी देशराज को लाल ॥ पाँच कोस मोहबा है बाकी जहँ पर बसैं रजापरिमाल ४१ सुनि सुनि बातें सबनेगिनकी सूरज मनै गयो तसआय ॥ नेगिन लैके सूरज ऊदन पहुँचे जहाँ चँदेलोराय ४२ सजी कचहरी परिमालिक की भारी लाग राज दरबार ॥ ब्रह्मा आल्हा मलखे देबा सय्यद बनरसका सरदार ४३ देखिकै सूरजको परिमालिक बोले मधुर वचन मुसुकाय ॥ कहाँते आयो औ कहँ जैहौ आपन हाल देउ बतलाय ४४ सुनिकै बातें परिमालिककी सूरज यथातथ्य गे गाय ॥ हाल जानिकै सब चंदेलो बोला सुनो बनाफरराय ४५ ११

६ • आल्हाखण्ड । १६२ टीका आयो पथरीगढ़का ताको तुरत देउ लौटाय ॥ ब्याह बिसेने घर करिबे ना मानों कही उदयसिंहराय ४६ घोड़ अगिनियाँ तिनके घरमाँ ज्यहिके मारे फौज बिलाय ॥ सुनिकै बातें परिमालिक की बोले तुरत बनाफरराय ४७ दतिया मारि उरैछोमारो पहुँचे सेतुबंध लों जाय ॥ पेशावर मुल्तान कमायूं बूंदी थहर थहर थहराय ४८ अटक पारलों झंडा गड़िगो औ मेवात लीन लुटवाय ॥ गर्व न राखा क्यहु क्षत्री का मानो कही चंदेलोराय ४६ गिनती किनमें बिसियानन की ठाढ़े तखत देउँ उलटाय ॥ हीनी मुखसों तुम भाषतहौ मेरो रजपूती धर्म नशाय ५० मलखे ब्याहनको रैहैं ना यहु दिन कहिबेको रहिजाय ॥ टीका लौटी ना मोहबे ते राजा सत्य दीन बतलाय ५१ बोला चंदेला तब देबा ते अब तुम शकुन विचारो भाय ॥ कैसी गुजरी पथरीगढ़ में सो सब हाल देउ बतलाय ५२ सुनिकै बातें परिमालिककी देबा पोथी लीन उठाय ॥ शकुन सोचिकै देबा बोला साँची कहौं चंदेलोराय ५३ जीति तुम्हारी है पथरीगढ़ काहू बार न बाँको जाय ॥ आजु कि साइति भल नीकीहै टीका अबै देउ चढ़वाय ५४ सुनिकै बातें ये देबाकी महलन खबरिदीन पहुँचाय ॥ गा हरिकारा दशहरिपुरखा द्यावलि बिरमा लवालवाय ५५ आँगन लीपागा गोबर सों मोतिन चौक दीन पुरवाय ॥ चूड़ामणि पण्डित फिरिआये तुरतै सूरज लये बुलाये ५६ चारो नेगी सँग में लैके सूरज महल पहुँचे आय ॥ चरण लागिकै मलखाने के बीरा मुखमें दीन खवाय ५७

मलखानका बिवाह । १६३ ७

सखियाँ गावन मंगल लागीं नेगिन झगर मचावा आय ॥ सोने चाँदी के गहना को सूरज सबै दीन पहिराय ५८ ऊदन पहुँचे निज कमरामें डिब्बा लाये तुरत उठाय ॥ खूब पहिरावा सब नेगिन को चारों खुशीभये अधिकाय ५६ बचा बचावा जो गहना रहे नेगिन स्वऊ दीन पकराय ॥ औरो नेगी जो पथरीगढ़ तिनको यहौ दिह्यो पहिराय ६० ऊदन बोले फिरि नेगिनसे तुम गजराज दिह्यो समुझाय ॥ माघ शुक्ल तेरसि की साइति होई ब्याह तहांपर आय ६१ हाथ जोरिकै सूरज बोले आज्ञा देउ चंदेलोराय ॥ हम चलिजावें पथरीगढ़ को राजै खबरि सुनावैं जाय ६२ बातें सुनिकै ये सूरज की राजै हुकुम दीन फर्माय ॥ राम जुहार तुरत फिरिकरिकै सूरज कूच दीन करवाय ६३ सौ सौ तोपैं दगीं सलामी पठवन चले लहुरवाभाय ॥ बिदा माँगिकै फिरि ऊदनसों अपने नेगी संगलिवाय ६४ सूरज चलिभे पथरीगढ़को माहिल कथा कहौं अब गाय ॥ कहुँ सुधिपाई माहिल ठाकुर टीका चढ़ा मोहोबे जाय ६५ लिल्हीघोड़ी को मँगवायो तापर तुरत भयो असवार ॥ सूरजतेनी आगे पहुँचा ठाकुर उरई का सरदार ६६ सजी कचहरी गजराजा की भारी लाग राज दरबार ॥ झारि बिसेने सब बैठे हैं टिहुननधरे नाँगि तलवार ६७ माहिल पहुँचे त्यहि समया में राजै कीन्ह्यो राम जुहार ॥ बड़ी खातिरी राजै कीन्ह्यो बैठा उरई का सरदार ६८ राजा बोले फिरि माहिलते नीके रहे खूब तुम भाय ॥ माहिल बोले फिरि राजाते भइ अनहोनी कहींनाजाय ६६

८ आल्हाखण्ड । १६४ बेटी तुम्हरी गजमोतिनि का टीका चढ़ा मोहोबे जाय ॥ जाति बनाफर की हीनी है जानौं भलीभांति तुमभाय ७० पानी पीहै को घर तुम्हरे आपन धर्म गँवैहै आय ॥ अबै न बिगरा कछु राजा है साँचे हाल दीन बतलाय ७१ सुनिकै बातें ये माहिल की राजा गयो सनाकाखाय ॥ तबलों सूरज अटा कचहरी राजै शीश नवायो आय ७२ राजा बोल्यो फिरि सूरजते टीका कहाँ चढ़ायो जाय ॥ दोउ कर जोरे सूरज बोले दादा सत्य देउँ बतलाय ७३ दिल्लीकनउज हम फिरि आयन टीका क्यहुन लीन महिपाल ॥ मोहबे उरई के अन्दर में मिलिगे देशराज के लाल ७४ लै बरजोरी गे मोहबे को टीका चढ़ा वीर मलखान ॥ जो कछु रारिकरत मोहबे में दादा जात प्रान पर आन ७५ माघ शुक्ल तेरसिको अइहैं यह सच साइतिका परमान ॥ मारब ब्याहब जो कछु कहिहौं उतनै घनै भई है हान ७६ जितना टीका में दै आये लाये आपन प्राण बचाय ॥ साम दाम अरु दण्ड भेद सों कीन्हे काज तहांपर जाय ७७ सुनिकै बातें ये सूरज की राजै पास लीन बैठाय ॥ फिरि शिरसूंघ्यो गजराजा ने लीन्ह्यो तुरतै गले लगाय ७८ राजा बोल्यो फिरि माहिल ते ठाकुर उरई के सरदार ॥ ब्याहन अइहैं जब हमरे घर तबहीं चली तुरत तलवार ७६ ब्याह न होई गजमोतिनि का तुमते साँच दीन बतलाय ॥ बिदा मांगिकै फिरि राजासों माहिल चले बड़ा सुखपाय ८० माघ महीना आवन लाग्यो धावन लगे मोहोबे दूत ॥ लिखिलिखिचिट्ठी परिमालिकने न्यवतन हेत पठावा दूत ८१

मलखानका विवाह। १६५ ६ दिल्ली कनउज औ नैनागढ़ उरई न्यवत दीन पठवाय ॥ सिरउज पनउज औ बौरी में न्यवता भेजा चँदेलोराय ८२ पायके चिट्ठी परिमालिककै इनको मानि बड़ो ब्यवहार ॥ नगर मोहोबे के जानेको राजा होन लागि तय्यार ८३ बाजे डंका अहर्तका के राजन कूचदीन करवाय ॥ तेरस केरो शुभ मुहूर्त पढ़ मोहबे गये सबै नृप आय ८४ तम्बू गड़िगे महराजन के खातिर कीन उदयसिंहराय ॥ पढ़े पढ़ाये सब क्षत्री रहें अपने धर्म कर्म समुदाय ८५ उचित औ अनुचितके ज्ञातारहें जानैं राजनीति सब भाय ॥ देश आरिया यह बाजत है आर्य कहै बसिंदा जायँ ८६ आर्य ऊदन त्यहि समया में सबको खुशी कीन अधिकाय ॥ तुरत नगड़ची को बुलवायो तासों कह्यो हाल समुझाय ८७ बाजे डंका अब मोहवे माँ सबियाँ फौज होय तय्यार ॥ सुनिकै बातें ये ऊदन की डंका भजनलाग त्यहिबार ८८ मलखे आये फिरि महलन में होवन लाग तेल त्योहार ॥ एक कुमारी तेल चढ़ावै गावैं सबै मंगलाचार ८६ माय मन्तरा भे दूसरे दिन नहखुर समयगयो फिरिआय ॥ लैके महाउर नाइनि आई नहखुर करन लागि हर्षाय ६० जो कछु माँग्यो ज्यहि नेगी ने मल्हना दीन ताहिसमुझाय ॥ मनके भाय जब सब पाये नेगिन खुशी कहीनाजाय ६१ कुँवाँ बियाहन के समया में मलखे चढ़ पालकी धाय ॥ बिटिया मल्हना की चन्द्रावाले राई नोन उनारति जाय ६२ जायकै पहुंचे फिरि कुँवनापर बिरमा पैर दीन लटकाय ॥ भाँवरि घूम्यो मलखाने ने लीन्ह्यो माता पैर उठाय ६३

[Header] १० आल्हखण्ड । १६६


बहू लय आवौं त्वरि सेवा को | माता बाग दिह्यौ लगवायं ॥ ऐसा कहिकै मलखाने ने | भाँवरि घुमी सातहू धाय ९४ पाँय लागिकै फिरि मल्हनाके | द्यावलि चरणनशीशनवाय ॥ चरणन लाग्यो जब बिरमा के | मातालीन्ह्यो हृदय लगाय ९५ पंजा फेस्यो फिरि मल्हना ने | तुम्हरो बार न बाँका जाय ॥ बैठि पालकी मलखाने गे | मनमें श्रीगणेशकोध्याय ९६ बाजन बाजे फिरि मोहबे माँ | हाहाकारी शब्द सुनाय ॥ हाथी सजिगा पचशब्दा तहँ | आल्हा चढ़े रामकोध्याय ९७ हरनागर की फिरि पीठी माँ | ब्रह्मा फाँदि भये असवार ॥ बीरशाह बौरी का राजा | रूपन सिर्रउज का सरदार ९८ देवकुँवरि रानी के बालक | पनउज केरे मदन गुपाल ॥ ये सब क्षत्री चढ़ि घोड़नपर | औरौ सजे बहुत नरपाल ९६ घोड़ मनोहर देवा बैठे | सय्यद सिर्गापर असवार ॥ सजा बेंदुला का चढ़वैया | जो दिनरात करै तलवार १०० घोड़ी कबूतरी मलखाने की | कोतल तुरत भई तय्यार ॥ लख्खा गर्रा पँचकल्यानी | हरियलमुश्की घोड़अपार १०१ सुर्खा सब्जा सिर्गा मुँरगा | ताजी तुरकी रंग बिरंग ॥ कच्छी मच्छी काबुल वाले | तिनकीकसीगईफिरि तंग १०२ डारि रकाबै गंगा यमुनी | मुखमें दीन लगाम लगाय ॥ परीं हयकलें सब घोड़न के | मेंहदी बूटा रहे बनाय १०३ नवल बछेड़ा सब साजेगे | एकते एक रूप अधिकाय ॥ हथी महावत हाथी लै कै | तिनपर हौदादये धराय १०४ हाथी सजिगे जब मोहबे में | तोपै सबै भई तय्यार ॥ पहिल नगाड़ामें जिनबन्दी | दूसरे फाँदिभये असवार १०५

मलखानका बिवाह । १६७ १३ तिमर नगाड़ाके बाजत खन क्षत्रिन कूच दीन करवाय ॥ बाजे डंका अहलंका के बंका चले शूर समुदाय १०६ मारु मारुकै मौहरि बाजै बाजै हाव हाव करनाल ॥ खर खर खर खर कै रथ दौरे रब्बाचले पवनकी चाल १०७ लक्ष पताका यकमिल हैगे नभमाँ गई लालरी छाय ॥ धूरि उड़ानी हय टापन सों बाबा सूरज गये छिपाय १०८ ब्याकुल हैकै पक्षी भागे जंगल जीव गये थर्राय ॥ चलीं बरातें मलखाने की हमरे बूत कहीं ना जाय १०६ सात रोजकी मैजलि करिकै पहुँचे तुरत धुरेपर आय ॥ तम्बू गड़िगे महराजन के झंडा सरग फरहरा खायँ ११० सजिगा तम्बू तहँ आल्हा का भारी लाग खूब दरबार ॥ चूड़ामणि पण्डित तहँ आयौ साइति लाग्योकरनबिचार १११ साइति नीकी अब आई है ऐपनवारी देउ पठाय ॥ हाथ जोरिकै रूपन बोला नेगी कौन तहाँ को जाय ११२ हम नहिं जैहैं पथरी गढ़को सांची सुनो बनाफरराय ॥ बातें सुनिकै ये रूपन की बोलातुरत ललुरवा भाय ११३ घोड़ी कबूतरी दादावाली रूपन चढ़ो ताहिपर जाय ॥ बानाराखे रजपूती का कैसे बने जनाना भाय ११४ सवैया ॥ प्राण न प्यार करें रणशूर कहैं ललिते हम सत्य विचारी । सोनकोधारि झमा झमकारि सो जातसदा पियसेजमें नारी ॥ पाय निशा चमकै तहँ नारि सो रारिकिये चमकै तलवारी । शेरिकिये यश शूरने होत सो कूरनकी अपकीरति भारी १६५

१२ आल्हखण्ड । १६८ सुनिकै बातें ये ऊदनकी रूपन बहुतगयो शर्म्याय ॥ घोड़ी कबुतरी पर चढ़ि बैठ्यो ऐपनवारी लीन उठाय ११६ माथ नायकै सब क्षत्रिन को मनियादेव हृदय सों ध्याय ॥ चारिघरी के फिरि अरसा माँ फाटक ऊपर पहूँचा आय ११७ हुकुम दर्ररै हुकुम दर्ररै साहेबजादे बात बनाय ॥ कहाँते आये औ कहँ जैहै आपन काम देय बतलाय ११८ सुनिकै बातें दरबानी की बोला घोड़ी का असवार ॥ नगर मोहोबा जगमें जाहिर नामी मोहबे के सरदार ११९ ब्याहन मलखे को आयन हैं मानो साची कही हमार ॥ ऐपनवारी बारी लायो बोलो ठाढ़ो राज दुवार १२० नेग आपने को झगरत है भारी नेग चहै कछुदार ॥ नेग आपनो का तुमचाहौ बोलो घोड़ी के असवार १२१ घोड़ी जोड़ी लैके जाई डांड़े परे तासु भर्त्तार ॥ बोलु गवाँरे अब ऐसे ना द्वारे चहौं चलै तलवार १२२ सुनिकै बातें ये रूपन की चक्रुत द्वारपाल भा द्वार ॥ फिरि २ देखै दिशि रूपन के फिरि २ लावै शोच बिचार १२३ ऐसो बारी हम देखा ना जैसो आयो आज दुवार ॥ सोचि समुझिकै फिरिसो बोला बोलो घोड़े के असवार १२४ गरमी तुम्हरी अब कछु उतरी बोलो नेग काह तुम द्वार ॥ चार घरी भर चलै सिरोही द्वारे बहै रक्त की धार १२५ नेग हमारो यह साँचा है याँचा द्वार तुम्हारे आय ॥ जौन शूरमा हो पथरीगढ़ हमरो नेग देय चुकवाय १२६ ऐसे वैसे हम बारी ना मारी सदा शूर दश पांच ॥ खबरि सुनावै तू राजा का तेरी निकरिपरै कस कांच १२७

मलखानका विवाह । १६९ १३ सुनिकै बातें ये रूपन की पहुँचा द्वारपाल दरबार ॥ झारि बिसेने सब बैठे हैं एकते एक शूर सरदार १२८ हाथ जोरि औ बिनती करिकै बोला द्वारपाल शिरनाय ॥ ऐपनावारी बारी लायो भारी नेग चहै ह्याँ आय १२९ चार पहरभर चलै सिरोही द्वारे बहै रक्तकी धार ॥ नेग आपनो बारी बोलै लीन्हे हाथ ढाल तलवार १३० सुनिकै बातें द्वारपाल की तब गजराजा उठा रिसाय ॥ बाँधिकै मुशकें त्यहि बारी की सूरज मोहिं दिखावै आय १३१ इतना सुनिकै मानसिंह तहँ द्वारे तुरत पहुँचा आय ॥ सेल चलायो त्यहि रूपनापर रूपनालीन्ह्यो वारबचाय १३२ मार्यो लटुवा फिरि भालाको शिरते चली खूनकी धार ॥ ऐँड़ा मसक्यो फिरि घोड़ी के फाटकनिकरिगयोवहिपार१३३ बहुतक दौरे फिरि पाछे सों धरु धरु मारु करें लतकार ॥ घोड़ी कबुतरी मलखेवाली नामी मोहबेका सरदार १३४ त्यहिके बलसों रूपन बारी बहुतन मारि मिलायो खार ॥ जायकै पहुँचा फिरि तम्बुन में भारी लाग जहाँ दरबार १३५. दीख्यो ऊदन तहँ रूपन का मानों फगुई का त्यवहार ॥ कैसी गुजरी रहै द्वारेपर बोले उदयसिंह सरदार १३६ सुनिकै बातें ये ऊदन की रूपन यथातथ्य गा गाय ॥ खेत छूटिगा दिननायक सों झंडागड़ा निशाको आय१३७ तारागण सब चमकन लागे संतन धुनी दीन परचाय ॥ परे आलसी खटिया.तकितकि घों घों कण्ठ रहा घर्राय १३८ करौं बन्दना गणनायक की दोनों चरणकमल शिरनाय ॥ शीश नवावों पितु अपने को मनमें सदा रामपदध्याय १३६