आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२ आल्हाखण्ड । १५८ भोजन खावै हरिको ध्यावै साँचो ग्राहक दीन बताय ३ नाहक जग में कोउ पछतावै भावै नहीं दूसरो काज ॥ देही आपनि गलि गलि जावै आवै फेरि जगत में लाज ४ छूटि सुमिरनी गै ह्वाँते अब शाका सुनो शूरमन क्यार ॥ ब्याह बखानों मलखाने का लड़िहैं बड़े बड़े सरदार ५ अथ कथाप्रसंग ॥ यहु गजराजा पथरीगढ़ को ज्याहिको भरी लाग दरबार ॥ बैठक बैठे सब छत्री हैं एकते एक शूर सरदार १ सुवा पहाड़ी कहुँ पिंजरन में महलन नाचिरहे कहुँ मोर ॥ बैठि कबूतर कहुँ घुटकत हैं तीतर बोलिरहे कहुँ जोर २ घोड़ अगिनिया त्यहि राजाके साजा सबै विधाता काज ॥ है गजमोतिनि त्यहिकी बेटी विद्या रूप शील शिरताज ३ सो नित खेलै सँग सखियन में मेलै सदा गले में हाथ ॥ सेमा भगतिनि की चेली है गुटवा ख्यलै सखिन के साथ ४ खेलत खेलत कछु सखियों ने कीन्ही तहाँ ब्याह की बात ॥ कोउकोउ सखियाँ तहँ ब्याहीथीं जानैं भलो श्वशुरपुर नात ५ ब्याही बोलैं अनब्याहिन सों सखियो सुनो हमारी बात ॥ सुरपुर हरपुर हरिपुर नाहीं जो सुख मिलै श्वशुरपुरंरात ६ सुनि सुनि बातें ये ब्याहिनकी तहँ अनब्यहीमनै अकुलायँ ॥ फिरिफिरिपूँछैं तिन सखियनसों कासुखश्वशुरपुरैअधिकाय ७ बतियाँ घतियाँ जे बालम की छतियाँ छुवैं और अठिलायँ ॥ रतियाँ केरी सब बतियाँ को सखियाँ कहैं और हरपायँ ८ सुरपुर हरपुर हरिपुर नाहीं जो सुखश्वशुरपुरै अधिकाय ॥ सुनि सुनि बातें ये ब्याहिनकी मनमाँ गई बात ये छाय ६