आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
DevanagariHindipublished618 पृष्ठ
पृष्ठ 162, कुल 618 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 162
अथ आल्हखण्ड ॥ मलखानका बिवाह अथवा पथरी- गढ़की लड़ाई ॥ सवैया ॥ ध्यावत तोहिं सदा हनुमान यही बरदान मिलै मोहिं स्वामी । हाथ लिये धनुबान कृपान मिलैं भगवान जे अन्तरयामी ॥ टारे टरैं न कबों उरते तिन राम नमामि नमामि नमामि । जान यही ललिते बरदान सुनो हनुमान सदा सुखधामी १ सुमिरन ॥ तुलसी हुलसी अब दुनिया में झुलसी सकल नरनकीकावि ॥ घर घर पोथी रामायण की दर दर फिरैं बगल में दाबि १ गिरिगिरि चन्दन नहिं होवैंकहुँ बन बन नहीं रहैं गजराज ॥ नारि पतिव्रत नाहिं घर घर हैं थल थल नहीं होयँ कविराज २ ग्राहक होवैं नहिं दुनिया में तब गुण जावैं सबै हिराय ॥