आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४० आल्हखण्ड । १५६
राखौ गति अद्भुत दर्शानी २ ॥ निशि दिन पापकर्मरत प्राणी सत्यासत्य भुलानी ॥ हत्यालाख धरत शिर ऊपर मोह बेदना ठानी ॥ १ ॥ नाती पूत शोच बश परकर आतमज्ञान हिरानी ॥ अहं अहं डहकत दरवाजे देखत नारि बिरानी ॥ २ ॥ अभिमानी नित देखत आंखिन मरतजात बहुप्रानी ॥ तवहूं तनक चेत मननाहीं रटै रामगुणखानी ॥ ३ ॥ हटै अकाल सुकाल बढ़ै जग नाशाय रोग निशानी ॥ सो नहिं होनहार हम देखत होयँ बहुतनरज्ञानी ॥४॥ अभिमानी लाखन हम देखत ज्ञानी दशहु न जानी ॥ होत प्रपंच साधु सन्तनमें पंचन नाहिं ठिकानी ॥ ५ ॥ तजि दुर्गा अर्चन नर पामर गति मुर्गाकी आनी ॥ लैहँड़िपुत्र पौत्र उपजावत अनशिक्षित अभिमानी॥६॥ तेइ मर्य्याद धर्मकी नाशत भाषत झूठ गुमानी ॥ मात पिताको मूरख कहिकै देवत कष्ट महानी ॥ ७ ॥ यह कलियुगकी देखि बड़ाई कहत ललित यहबानी ॥ राघौ राम और रघुनन्दन इन बन्दन दुखहानी ॥ ८ ॥ चलो मन जहाँ बसैं रघुराज । चलो मन जहाँ बसैं रघुराज ॥ यहि दुनिया में कौन हमारो हम क्याहिके क्याहिकाज ॥ देखत जो कछु रहत न सो कछु ढहत काल शिरताज ॥ १ ॥ गहत कौनके रहत कौन नर सोइ कहत हम आज ॥ रघुनन्दन जगवन्दन ज्यहि सुत त्यहि शिरपर दुखभ्राज ॥ २ ॥ सेयो यशोदा नन्द कृष्णको सोऊ न आये काज ॥ वैरिनि त्रिपाति सबहिं शिरऊपर देखिलेहु महराज ॥ ३ ॥ जो मन फैसे जगत के अन्दर बन्दरसम बिनलाज ॥ द्वारद्वार नट तिन्है नचावत ललित पेट के काज ॥ ४ ॥