भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

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मलखानका विवाह । १६१ ५ हनवन केरी यह सामा ना झूंठी बात रह्यो बतलाय ॥ सूरज बोले फिरि ऊदन ते सांची सुनो बनाफरराय ३४ टीका लाये हम बहिनी का दिल्ली कनउज आये मँझाय ॥ टीका लीन्ह्यो क्यहु क्षत्री ना जावैं लौटि बनाफरराय ३५ इतना सुनिकै ऊदन बोले हमपर शारद भई सहाय ॥ दादा कोर मलखाने हैं टीका लिहे चलो तुम भाय ३६ सुफल तुम्हारी मेहनत होई हमरो काज सिद्ध है जाय ॥ सुनिकै बातें ये ऊदन की सूरज बोला बचन रिसाय ३७ नहीं आज्ञा महराजा की टीका नग्र मोहोबे जाय ॥ जाति बनाफर की हीनी है कीरति रही जगत में छाय ३८ सुनिकै बातें ये सूरज की बोला उदयसिंह सरदार ॥ नीके जैहौ तौ लैजैहौं नहिं यह देखिलेउ तलवार ३६ सुनिकै बातें ये ऊदन की नाई बारी उठे डेराय ॥ ते समुझावैं भल सूरजको मानो कही बिसेनेराय ४० रारि न करियो तुम ऊदनते नामी देशराज को लाल ॥ पाँच कोस मोहबा है बाकी जहँ पर बसैं रजापरिमाल ४१ सुनि सुनि बातें सबनेगिनकी सूरज मनै गयो तसआय ॥ नेगिन लैके सूरज ऊदन पहुँचे जहाँ चँदेलोराय ४२ सजी कचहरी परिमालिक की भारी लाग राज दरबार ॥ ब्रह्मा आल्हा मलखे देबा सय्यद बनरसका सरदार ४३ देखिकै सूरजको परिमालिक बोले मधुर वचन मुसुकाय ॥ कहाँते आयो औ कहँ जैहौ आपन हाल देउ बतलाय ४४ सुनिकै बातें परिमालिककी सूरज यथातथ्य गे गाय ॥ हाल जानिकै सब चंदेलो बोला सुनो बनाफरराय ४५ ११