आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६ • आल्हाखण्ड । १६२ टीका आयो पथरीगढ़का ताको तुरत देउ लौटाय ॥ ब्याह बिसेने घर करिबे ना मानों कही उदयसिंहराय ४६ घोड़ अगिनियाँ तिनके घरमाँ ज्यहिके मारे फौज बिलाय ॥ सुनिकै बातें परिमालिक की बोले तुरत बनाफरराय ४७ दतिया मारि उरैछोमारो पहुँचे सेतुबंध लों जाय ॥ पेशावर मुल्तान कमायूं बूंदी थहर थहर थहराय ४८ अटक पारलों झंडा गड़िगो औ मेवात लीन लुटवाय ॥ गर्व न राखा क्यहु क्षत्री का मानो कही चंदेलोराय ४६ गिनती किनमें बिसियानन की ठाढ़े तखत देउँ उलटाय ॥ हीनी मुखसों तुम भाषतहौ मेरो रजपूती धर्म नशाय ५० मलखे ब्याहनको रैहैं ना यहु दिन कहिबेको रहिजाय ॥ टीका लौटी ना मोहबे ते राजा सत्य दीन बतलाय ५१ बोला चंदेला तब देबा ते अब तुम शकुन विचारो भाय ॥ कैसी गुजरी पथरीगढ़ में सो सब हाल देउ बतलाय ५२ सुनिकै बातें परिमालिककी देबा पोथी लीन उठाय ॥ शकुन सोचिकै देबा बोला साँची कहौं चंदेलोराय ५३ जीति तुम्हारी है पथरीगढ़ काहू बार न बाँको जाय ॥ आजु कि साइति भल नीकीहै टीका अबै देउ चढ़वाय ५४ सुनिकै बातें ये देबाकी महलन खबरिदीन पहुँचाय ॥ गा हरिकारा दशहरिपुरखा द्यावलि बिरमा लवालवाय ५५ आँगन लीपागा गोबर सों मोतिन चौक दीन पुरवाय ॥ चूड़ामणि पण्डित फिरिआये तुरतै सूरज लये बुलाये ५६ चारो नेगी सँग में लैके सूरज महल पहुँचे आय ॥ चरण लागिकै मलखाने के बीरा मुखमें दीन खवाय ५७