आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
६ • आल्हाखण्ड । १६२ टीका आयो पथरीगढ़का ताको तुरत देउ लौटाय ॥ ब्याह बिसेने घर करिबे ना मानों कही उदयसिंहराय ४६ घोड़ अगिनियाँ तिनके घरमाँ ज्यहिके मारे फौज बिलाय ॥ सुनिकै बातें परिमालिक की बोले तुरत बनाफरराय ४७ दतिया मारि उरैछोमारो पहुँचे सेतुबंध लों जाय ॥ पेशावर मुल्तान कमायूं बूंदी थहर थहर थहराय ४८ अटक पारलों झंडा गड़िगो औ मेवात लीन लुटवाय ॥ गर्व न राखा क्यहु क्षत्री का मानो कही चंदेलोराय ४६ गिनती किनमें बिसियानन की ठाढ़े तखत देउँ उलटाय ॥ हीनी मुखसों तुम भाषतहौ मेरो रजपूती धर्म नशाय ५० मलखे ब्याहनको रैहैं ना यहु दिन कहिबेको रहिजाय ॥ टीका लौटी ना मोहबे ते राजा सत्य दीन बतलाय ५१ बोला चंदेला तब देबा ते अब तुम शकुन विचारो भाय ॥ कैसी गुजरी पथरीगढ़ में सो सब हाल देउ बतलाय ५२ सुनिकै बातें परिमालिककी देबा पोथी लीन उठाय ॥ शकुन सोचिकै देबा बोला साँची कहौं चंदेलोराय ५३ जीति तुम्हारी है पथरीगढ़ काहू बार न बाँको जाय ॥ आजु कि साइति भल नीकीहै टीका अबै देउ चढ़वाय ५४ सुनिकै बातें ये देबाकी महलन खबरिदीन पहुँचाय ॥ गा हरिकारा दशहरिपुरखा द्यावलि बिरमा लवालवाय ५५ आँगन लीपागा गोबर सों मोतिन चौक दीन पुरवाय ॥ चूड़ामणि पण्डित फिरिआये तुरतै सूरज लये बुलाये ५६ चारो नेगी सँग में लैके सूरज महल पहुँचे आय ॥ चरण लागिकै मलखाने के बीरा मुखमें दीन खवाय ५७
मलखानका बिवाह । १६३ ७
सखियाँ गावन मंगल लागीं नेगिन झगर मचावा आय ॥ सोने चाँदी के गहना को सूरज सबै दीन पहिराय ५८ ऊदन पहुँचे निज कमरामें डिब्बा लाये तुरत उठाय ॥ खूब पहिरावा सब नेगिन को चारों खुशीभये अधिकाय ५६ बचा बचावा जो गहना रहे नेगिन स्वऊ दीन पकराय ॥ औरो नेगी जो पथरीगढ़ तिनको यहौ दिह्यो पहिराय ६० ऊदन बोले फिरि नेगिनसे तुम गजराज दिह्यो समुझाय ॥ माघ शुक्ल तेरसि की साइति होई ब्याह तहांपर आय ६१ हाथ जोरिकै सूरज बोले आज्ञा देउ चंदेलोराय ॥ हम चलिजावें पथरीगढ़ को राजै खबरि सुनावैं जाय ६२ बातें सुनिकै ये सूरज की राजै हुकुम दीन फर्माय ॥ राम जुहार तुरत फिरिकरिकै सूरज कूच दीन करवाय ६३ सौ सौ तोपैं दगीं सलामी पठवन चले लहुरवाभाय ॥ बिदा माँगिकै फिरि ऊदनसों अपने नेगी संगलिवाय ६४ सूरज चलिभे पथरीगढ़को माहिल कथा कहौं अब गाय ॥ कहुँ सुधिपाई माहिल ठाकुर टीका चढ़ा मोहोबे जाय ६५ लिल्हीघोड़ी को मँगवायो तापर तुरत भयो असवार ॥ सूरजतेनी आगे पहुँचा ठाकुर उरई का सरदार ६६ सजी कचहरी गजराजा की भारी लाग राज दरबार ॥ झारि बिसेने सब बैठे हैं टिहुननधरे नाँगि तलवार ६७ माहिल पहुँचे त्यहि समया में राजै कीन्ह्यो राम जुहार ॥ बड़ी खातिरी राजै कीन्ह्यो बैठा उरई का सरदार ६८ राजा बोले फिरि माहिलते नीके रहे खूब तुम भाय ॥ माहिल बोले फिरि राजाते भइ अनहोनी कहींनाजाय ६६
८ आल्हाखण्ड । १६४ बेटी तुम्हरी गजमोतिनि का टीका चढ़ा मोहोबे जाय ॥ जाति बनाफर की हीनी है जानौं भलीभांति तुमभाय ७० पानी पीहै को घर तुम्हरे आपन धर्म गँवैहै आय ॥ अबै न बिगरा कछु राजा है साँचे हाल दीन बतलाय ७१ सुनिकै बातें ये माहिल की राजा गयो सनाकाखाय ॥ तबलों सूरज अटा कचहरी राजै शीश नवायो आय ७२ राजा बोल्यो फिरि सूरजते टीका कहाँ चढ़ायो जाय ॥ दोउ कर जोरे सूरज बोले दादा सत्य देउँ बतलाय ७३ दिल्लीकनउज हम फिरि आयन टीका क्यहुन लीन महिपाल ॥ मोहबे उरई के अन्दर में मिलिगे देशराज के लाल ७४ लै बरजोरी गे मोहबे को टीका चढ़ा वीर मलखान ॥ जो कछु रारिकरत मोहबे में दादा जात प्रान पर आन ७५ माघ शुक्ल तेरसिको अइहैं यह सच साइतिका परमान ॥ मारब ब्याहब जो कछु कहिहौं उतनै घनै भई है हान ७६ जितना टीका में दै आये लाये आपन प्राण बचाय ॥ साम दाम अरु दण्ड भेद सों कीन्हे काज तहांपर जाय ७७ सुनिकै बातें ये सूरज की राजै पास लीन बैठाय ॥ फिरि शिरसूंघ्यो गजराजा ने लीन्ह्यो तुरतै गले लगाय ७८ राजा बोल्यो फिरि माहिल ते ठाकुर उरई के सरदार ॥ ब्याहन अइहैं जब हमरे घर तबहीं चली तुरत तलवार ७६ ब्याह न होई गजमोतिनि का तुमते साँच दीन बतलाय ॥ बिदा मांगिकै फिरि राजासों माहिल चले बड़ा सुखपाय ८० माघ महीना आवन लाग्यो धावन लगे मोहोबे दूत ॥ लिखिलिखिचिट्ठी परिमालिकने न्यवतन हेत पठावा दूत ८१
मलखानका विवाह। १६५ ६ दिल्ली कनउज औ नैनागढ़ उरई न्यवत दीन पठवाय ॥ सिरउज पनउज औ बौरी में न्यवता भेजा चँदेलोराय ८२ पायके चिट्ठी परिमालिककै इनको मानि बड़ो ब्यवहार ॥ नगर मोहोबे के जानेको राजा होन लागि तय्यार ८३ बाजे डंका अहर्तका के राजन कूचदीन करवाय ॥ तेरस केरो शुभ मुहूर्त पढ़ मोहबे गये सबै नृप आय ८४ तम्बू गड़िगे महराजन के खातिर कीन उदयसिंहराय ॥ पढ़े पढ़ाये सब क्षत्री रहें अपने धर्म कर्म समुदाय ८५ उचित औ अनुचितके ज्ञातारहें जानैं राजनीति सब भाय ॥ देश आरिया यह बाजत है आर्य कहै बसिंदा जायँ ८६ आर्य ऊदन त्यहि समया में सबको खुशी कीन अधिकाय ॥ तुरत नगड़ची को बुलवायो तासों कह्यो हाल समुझाय ८७ बाजे डंका अब मोहवे माँ सबियाँ फौज होय तय्यार ॥ सुनिकै बातें ये ऊदन की डंका भजनलाग त्यहिबार ८८ मलखे आये फिरि महलन में होवन लाग तेल त्योहार ॥ एक कुमारी तेल चढ़ावै गावैं सबै मंगलाचार ८६ माय मन्तरा भे दूसरे दिन नहखुर समयगयो फिरिआय ॥ लैके महाउर नाइनि आई नहखुर करन लागि हर्षाय ६० जो कछु माँग्यो ज्यहि नेगी ने मल्हना दीन ताहिसमुझाय ॥ मनके भाय जब सब पाये नेगिन खुशी कहीनाजाय ६१ कुँवाँ बियाहन के समया में मलखे चढ़ पालकी धाय ॥ बिटिया मल्हना की चन्द्रावाले राई नोन उनारति जाय ६२ जायकै पहुंचे फिरि कुँवनापर बिरमा पैर दीन लटकाय ॥ भाँवरि घूम्यो मलखाने ने लीन्ह्यो माता पैर उठाय ६३
[Header] १० आल्हखण्ड । १६६
बहू लय आवौं त्वरि सेवा को | माता बाग दिह्यौ लगवायं ॥ ऐसा कहिकै मलखाने ने | भाँवरि घुमी सातहू धाय ९४ पाँय लागिकै फिरि मल्हनाके | द्यावलि चरणनशीशनवाय ॥ चरणन लाग्यो जब बिरमा के | मातालीन्ह्यो हृदय लगाय ९५ पंजा फेस्यो फिरि मल्हना ने | तुम्हरो बार न बाँका जाय ॥ बैठि पालकी मलखाने गे | मनमें श्रीगणेशकोध्याय ९६ बाजन बाजे फिरि मोहबे माँ | हाहाकारी शब्द सुनाय ॥ हाथी सजिगा पचशब्दा तहँ | आल्हा चढ़े रामकोध्याय ९७ हरनागर की फिरि पीठी माँ | ब्रह्मा फाँदि भये असवार ॥ बीरशाह बौरी का राजा | रूपन सिर्रउज का सरदार ९८ देवकुँवरि रानी के बालक | पनउज केरे मदन गुपाल ॥ ये सब क्षत्री चढ़ि घोड़नपर | औरौ सजे बहुत नरपाल ९६ घोड़ मनोहर देवा बैठे | सय्यद सिर्गापर असवार ॥ सजा बेंदुला का चढ़वैया | जो दिनरात करै तलवार १०० घोड़ी कबूतरी मलखाने की | कोतल तुरत भई तय्यार ॥ लख्खा गर्रा पँचकल्यानी | हरियलमुश्की घोड़अपार १०१ सुर्खा सब्जा सिर्गा मुँरगा | ताजी तुरकी रंग बिरंग ॥ कच्छी मच्छी काबुल वाले | तिनकीकसीगईफिरि तंग १०२ डारि रकाबै गंगा यमुनी | मुखमें दीन लगाम लगाय ॥ परीं हयकलें सब घोड़न के | मेंहदी बूटा रहे बनाय १०३ नवल बछेड़ा सब साजेगे | एकते एक रूप अधिकाय ॥ हथी महावत हाथी लै कै | तिनपर हौदादये धराय १०४ हाथी सजिगे जब मोहबे में | तोपै सबै भई तय्यार ॥ पहिल नगाड़ामें जिनबन्दी | दूसरे फाँदिभये असवार १०५
मलखानका बिवाह । १६७ १३ तिमर नगाड़ाके बाजत खन क्षत्रिन कूच दीन करवाय ॥ बाजे डंका अहलंका के बंका चले शूर समुदाय १०६ मारु मारुकै मौहरि बाजै बाजै हाव हाव करनाल ॥ खर खर खर खर कै रथ दौरे रब्बाचले पवनकी चाल १०७ लक्ष पताका यकमिल हैगे नभमाँ गई लालरी छाय ॥ धूरि उड़ानी हय टापन सों बाबा सूरज गये छिपाय १०८ ब्याकुल हैकै पक्षी भागे जंगल जीव गये थर्राय ॥ चलीं बरातें मलखाने की हमरे बूत कहीं ना जाय १०६ सात रोजकी मैजलि करिकै पहुँचे तुरत धुरेपर आय ॥ तम्बू गड़िगे महराजन के झंडा सरग फरहरा खायँ ११० सजिगा तम्बू तहँ आल्हा का भारी लाग खूब दरबार ॥ चूड़ामणि पण्डित तहँ आयौ साइति लाग्योकरनबिचार १११ साइति नीकी अब आई है ऐपनवारी देउ पठाय ॥ हाथ जोरिकै रूपन बोला नेगी कौन तहाँ को जाय ११२ हम नहिं जैहैं पथरी गढ़को सांची सुनो बनाफरराय ॥ बातें सुनिकै ये रूपन की बोलातुरत ललुरवा भाय ११३ घोड़ी कबूतरी दादावाली रूपन चढ़ो ताहिपर जाय ॥ बानाराखे रजपूती का कैसे बने जनाना भाय ११४ सवैया ॥ प्राण न प्यार करें रणशूर कहैं ललिते हम सत्य विचारी । सोनकोधारि झमा झमकारि सो जातसदा पियसेजमें नारी ॥ पाय निशा चमकै तहँ नारि सो रारिकिये चमकै तलवारी । शेरिकिये यश शूरने होत सो कूरनकी अपकीरति भारी १६५
१२ आल्हखण्ड । १६८ सुनिकै बातें ये ऊदनकी रूपन बहुतगयो शर्म्याय ॥ घोड़ी कबुतरी पर चढ़ि बैठ्यो ऐपनवारी लीन उठाय ११६ माथ नायकै सब क्षत्रिन को मनियादेव हृदय सों ध्याय ॥ चारिघरी के फिरि अरसा माँ फाटक ऊपर पहूँचा आय ११७ हुकुम दर्ररै हुकुम दर्ररै साहेबजादे बात बनाय ॥ कहाँते आये औ कहँ जैहै आपन काम देय बतलाय ११८ सुनिकै बातें दरबानी की बोला घोड़ी का असवार ॥ नगर मोहोबा जगमें जाहिर नामी मोहबे के सरदार ११९ ब्याहन मलखे को आयन हैं मानो साची कही हमार ॥ ऐपनवारी बारी लायो बोलो ठाढ़ो राज दुवार १२० नेग आपने को झगरत है भारी नेग चहै कछुदार ॥ नेग आपनो का तुमचाहौ बोलो घोड़ी के असवार १२१ घोड़ी जोड़ी लैके जाई डांड़े परे तासु भर्त्तार ॥ बोलु गवाँरे अब ऐसे ना द्वारे चहौं चलै तलवार १२२ सुनिकै बातें ये रूपन की चक्रुत द्वारपाल भा द्वार ॥ फिरि २ देखै दिशि रूपन के फिरि २ लावै शोच बिचार १२३ ऐसो बारी हम देखा ना जैसो आयो आज दुवार ॥ सोचि समुझिकै फिरिसो बोला बोलो घोड़े के असवार १२४ गरमी तुम्हरी अब कछु उतरी बोलो नेग काह तुम द्वार ॥ चार घरी भर चलै सिरोही द्वारे बहै रक्त की धार १२५ नेग हमारो यह साँचा है याँचा द्वार तुम्हारे आय ॥ जौन शूरमा हो पथरीगढ़ हमरो नेग देय चुकवाय १२६ ऐसे वैसे हम बारी ना मारी सदा शूर दश पांच ॥ खबरि सुनावै तू राजा का तेरी निकरिपरै कस कांच १२७
मलखानका विवाह । १६९ १३ सुनिकै बातें ये रूपन की पहुँचा द्वारपाल दरबार ॥ झारि बिसेने सब बैठे हैं एकते एक शूर सरदार १२८ हाथ जोरि औ बिनती करिकै बोला द्वारपाल शिरनाय ॥ ऐपनावारी बारी लायो भारी नेग चहै ह्याँ आय १२९ चार पहरभर चलै सिरोही द्वारे बहै रक्तकी धार ॥ नेग आपनो बारी बोलै लीन्हे हाथ ढाल तलवार १३० सुनिकै बातें द्वारपाल की तब गजराजा उठा रिसाय ॥ बाँधिकै मुशकें त्यहि बारी की सूरज मोहिं दिखावै आय १३१ इतना सुनिकै मानसिंह तहँ द्वारे तुरत पहुँचा आय ॥ सेल चलायो त्यहि रूपनापर रूपनालीन्ह्यो वारबचाय १३२ मार्यो लटुवा फिरि भालाको शिरते चली खूनकी धार ॥ ऐँड़ा मसक्यो फिरि घोड़ी के फाटकनिकरिगयोवहिपार१३३ बहुतक दौरे फिरि पाछे सों धरु धरु मारु करें लतकार ॥ घोड़ी कबुतरी मलखेवाली नामी मोहबेका सरदार १३४ त्यहिके बलसों रूपन बारी बहुतन मारि मिलायो खार ॥ जायकै पहुँचा फिरि तम्बुन में भारी लाग जहाँ दरबार १३५. दीख्यो ऊदन तहँ रूपन का मानों फगुई का त्यवहार ॥ कैसी गुजरी रहै द्वारेपर बोले उदयसिंह सरदार १३६ सुनिकै बातें ये ऊदन की रूपन यथातथ्य गा गाय ॥ खेत छूटिगा दिननायक सों झंडागड़ा निशाको आय१३७ तारागण सब चमकन लागे संतन धुनी दीन परचाय ॥ परे आलसी खटिया.तकितकि घों घों कण्ठ रहा घर्राय १३८ करौं बन्दना गणनायक की दोनों चरणकमल शिरनाय ॥ शीश नवावों पितु अपने को मनमें सदा रामपदध्याय १३६
१४ आल्हाखण्ड । १७० करौं तरंग यहाँ सों पूरण तव पद सुमिरि भवानीकन्त ॥ को यशगावै शिवशंकर को जिनको वेद न पावैं अन्त १४० इति श्रीलखनऊनिवासि ( सी, आई, ई ) मुंशीनवलकिशोरात्मज बाबूप्रयागना- Rayanjiकी आज्ञानुसारउन्नामप्रदेशान्तर्गतपूँदरीकलांनिवासिमिश्रवंशोद्भवबुध कृपाशंकरसूनु पं० ललिताप्रसादकृत मलखानविवाहविषय वर्णनोनामप्रथमस्तरंगः ॥ १ ॥ सवैया ॥ दीननके मन मीनन को मेघवा है वरषत हौ नितवारी। होय भिखारि चहौ नरनारि किये प्रभुआश सदा सुखकारी ॥ दीन पुकार विभीषणकी सुनि आप हर्यो विपदासबहारी ॥ कौन सो दीन रहा शरणागत जो न भयो ललिते हितकारी १ सुमिरन ॥ धन्य बखानों मैं नारद को कीन्ह्यो बड़ा जगत उपकार ॥ शिक्षा देते नहिं दुष्टन को तौ कस धरत राम अवतार १ जो रघुनन्दन जग होते ना तौ यहचरित करत को भाय ॥ 'काह बखानत तुलसी कलियुग कैसे जात जगत यशछाय २ कृष्ण न होते जो द्वापर में कैसे सूर जात भवपार ॥ कोधों मारत शिशुपालै को कोधों करत कंस सों रार ३ कैसे अर्जुन भारत जीतत कैसे करत युधिष्ठिर राज ॥ कौन सो दुनिया में ऐसो भो जैसे भये कृष्ण महराज ४ छूटि सुमिरनी गै देवनकै - शाका सुनो शूरमन क्यार ॥ माहिल अइहैं उरई वाले जहँ गजराज केर दरबार ५ अथ कथाप्रसंग ॥ गा जब रूपन बनि द्वारे पर माहिल आयगयो ततकाल ॥
मलखानका बिवाह । १७१ १५ आदर करिकै बड़ माहिल का बोले मधुर बचन नरपाल १ ऐपनवारी बारी लायो कीन्ह्यो कठिन द्वार तलवार ॥ कैसे मरिहैं मोहबे वाले बोलो उरई के सरदार २ सुनिकै बातें ये राजा की माहिल बोले बचन उदार ॥ ज्यहि की नीकी बेटी ब्याखैं ऊदन गाँसैं तासु दुवार ३ मिर्चवान ब्याहे की पठवो तामें जहर देव मिलवाय ॥ बिना बयारी जूना टूटै औ बिन औषध हटै बलाय ४ बातें सुनिकै ये माहिल की राजा मनै फूलिगा भाय ॥ जहर घुरायो त्यहिं शर्बत माँ सूरज पुत्र दीन पठवाय ५ दिय जनवासा फिरि पथरीगढ़ पाछे शर्बत दीन पठाय ॥ आदर करिकै सूरज ठाकुर चाँदी आबखोर मँगवाय ६ लै अबखोरा भरि त्यहि शर्बत आल्हा पास पहुंचा जाय ॥ जब अबखोरा आल्हा लीन्ह्यों सम्मुख भई छींक तब आय ७ ऊदन बोले तब देवा ते अब तुम शकुन बताओ भाय ॥ देवा बोला तब ऊदन ते साँची सुनो लहुरवा भाय = कालरूप यहु शर्बत आयो सबकी मृत्यु गई नगच्याय ॥ धारि जनेऊ तब काने में सूरज उठा तड़ाका भाय ६ ऊदन बोले तब आल्हा ते कुत्ते देवो आप पियाय ॥ जो मरिजावै पी कुत्ता यह तौ सब जहर देव फिकवाय १० इतना सुनिकै नेगी चलिभे मारन लागि लहुरवा भाय ॥ बड़े दयालू आल्हा बोले ऊदन छाँड़ि देव यहि ठायाँ ११ प्रजा हमारी सम परजा हैं ठाकुर भागि गयो भयखाय ॥ नामी ठाकुर तुम मोहबे के इनपर दयाकरो यहि ठार्य १२ माधै राजा के नौकर हो तुम्हरो करै काह उपकार ॥
९६ आल्हखण्ड । १७२ संग न देवै जो राजा का तौ हनिमरै काढ़ि तलवार १३ । ऐसे दीनन के मारे ते ऊदन जावै धर्म नशाय ॥ बड़ी कठिनता नर परिजावै औ परिजायँ जानपर आय १४ 'ललिते दशरथ त्यहिसमयामाँ प्राणै दीन धर्म पर आय ॥ तैसे ऊदन कहा मानिकै धर्मै राखु दया पर आय १५ दया राखिकै इन नेगिन को सुखसों देव घरे पहुँचाय ॥ बड़ी दीनता इन नेगिन की सबकर गये प्राणघट आय १६ ऊदन ऐसे केहरि सम्मुख लरिकै कौन शूरमाँ जाय ॥ किह्यो बड़ाई बड़ भाई की आल्हा धर्म दीन समुझाय १७ ऊदन छाँड़यो तब नेगिन को नेगी घरे पहुंचे आय ॥ हाल बतायो गजराजा को सुनतै गयो सनाकाखाय १८ लिल्ली घोड़ी पर चढ़ बैठ्यो माहिल उरई को सरदार ॥ जायकै पहुँच्यो मुन्नागढ़माँ जहँपर भरी लाग दर्बार १६ बड़ी खातिरी भै माहिल कै राजा पास लीन बैठाय ॥ माहिल बोले वहि समया में ओ महराजा बात बनाय २० शर्बत खन्दक में डारागा सबकै कुशल भई यहि ठाएँ ॥ लड़े बनाफर ते जितिहौ ना तुमते सत्य दीन बतलाय २१ अब चलि जावो यहि समयामें आल्हा निकट तुरत महराज ॥ हाथ जोरिकै पाँयन परिकै कीन्ह्योअवाशि आपनोकाज२१ बली भयेपर छल करिये ना निर्बल भये छलौ सों काज ॥ होय हँसौवा कन्या बेहे औ नहिं रहै जगतमें लाज २३ ऐसे समया में महराजा करिये कौन दूसरो साज ॥ छली न बाजैं हम दुनियाँ में औ रहिजाय हमारी लाज २४ छल बल राजाका कर्मै है कर्म न होय प्रजनकर भाय ॥
मलखानका बिवाह । १७३ १७ धर्म व्यवस्था जहँ परिजावै तहँ सब करैं कहैं हम गाय २५ बातैं सुनिकै ये माहिल की राजा बड़ा कीन सतकार ॥ हमरे नीके के साथी हौ राजा उरई के सरदार २६ माहिलचलिभे फिरितम्बुनको राजै नेगी लीन बुलाय ॥ लैके तोड़ा दो रुपियन के औ नौ हीरा लीन उठाय २७ चलिभे राजा भुन्नागढ़ सों पथरीगढ़ै पहुंचे आय ॥ तहँपर पहुँचे त्यहि तम्बुन में जहँपर रहें बनाफरराय २८ जो कछु सामा लैके गेते आल्है नजरि दीन सो जाय ॥ देखिकै सामा महराजा की हर्षित भये बनाफरराय २६ ऊदन बोले फिरि राजा सों काहे किह्यो परिश्रम आय॥ तब गजराजा बोलन लागे मानो कही लहुरवाभाय ३० देश हमारे की रीती यह परचव लेयँ प्रथमही आय ॥ जहर पठावैं ते शर्वत में देखे बिना पियैं जे भाय ३१ बिना बुद्धिके ते नर कहिये उनके निकट कबौं ना जायँ ॥ पास परीक्षा तुमको जान्यो लरिकाभागिगयो भयखाय३२ पै जो पीवन आल्हा शर्बत सूरज तुरत देत बतलाय ॥ कछु छल नाहीं हम कीन्होरहै लरिकाभागिगयो भयखाय ३३ इकलो लड़का यहिसमयामें माड़ोतरे चलै हर्षाय ॥ भाँवरि होवैं त्यहि लड़का की हाथ न छुवै लोह कछुभाय ३४ सुनिकै बातें ये राजा की मलखे कहा बचन मुसुकाय ॥ छल की सानी सब बातें हैं घातैं सबै परैं दिखलाय ३५ इतना सुनिकै आल्हा बोले मानों कही विसेनेराय ॥ किरिया करिल्यो श्रीगंगा की तौ बर तुरत देयें पठवाय ३६ गङ्गा कीन्ही गजराजा ने औ यह कहा बचन परमान ॥
१८ आल्हखण्ड । १७४ छल जो राखैं तुम्हरे सँग में तौ म्वहिं सजायैं भगवान ३७ बातैं सुनिकै ये राजा की आल्हा कहा सुनो मलखान ॥ बैठि पालकी में अब जावो तुम्हरो भलो करैं भगवान ३८ सुनिकै बातैं ये आल्हा की मलखे सुमिरि दुर्गामाय ॥ तुरत पालकी में चढ़ि बैठे महरन पलकी लीन उठाय ३६ चारि घरी के फिरि अर्सा में महलन तुरत पहुँचे आय ॥ उतरि पालकी ते मलखाने मड़ये तरे पहुँचे जाय ४० फाटक बन्दी गजराजा करि क्षत्री सबै लीन बुलवाय ॥ रीति बिवाहे की जस चाही तैसे खंभ गड़ा तहँ भाय ४१ गाफिल दीख्यो मलखाने को बन्धन तुरत लीन करवाय ॥ बाँधिकै खंभा में मलखे को हरियर बांस लीन कटवाय ४२ मारन लागे मलखाने को जामा टूक टूक है जाय ॥ देखि तमाशा फुलियामालिनि महलन गई तड़ाका धाय ४३ खबरि सुनाई गजमोतिनि को जो कुछ कियो बिसेनेराय ॥ सुनि गजमोतिनि तहँ ते धाई कोठे ऊपर पहुंची आय ४४ नीचे दीख्यो त्यहि दुलहाको कङ्कण रहा हाथ दर्शाय ॥ तब गजराजा सों गजमोतिनि बोली आरत वचन सुनाय ४५ कहाँ को बँधुवा यहु आयो है जो अति सहै बाँस के घाय ॥ तुरतै छाँड़ो यहि बँधुवा को मोसों बिपतिदीखिनाजाय ४६ तब गजराजा कह बेटी सों खेलो सखिन साथ तुम जाय ॥ पैसा मारयो यहि ठाकुर ने तासों सहै बाँसके घाय ४७ मलखे दीख्यो तब कोठे को चारों नैन एक द्वैजायँ ॥ धरिकै हुमक्यो मलखाने ने खंभा उखरि गयो त्यहिठायँ ४८ बन्धन ढीलेभे मलखे के खंभा लीन हाथ तब भाय ॥
मलखानका विवाह । १७५ १६ लाग घुमावन तब खंभा को क्षत्री गये सनाकाखाय ४६ लात मारिकै इक छत्री को ताकी लीन ढाल तलवार ॥ मलखे ठाकुर के मारुन में आँगन बही रक्तकी धार ५० सिंह गरज्जनि मलखे गर्जे इत उत हनें बीर दश पांच ॥ जितने कायर रहें आँगन में देखत ढीलिहोइ तिन कांच ५१ फिरि फिरि मारै औ ललकारै नाहर समरधनी मलखान ॥ लरि लरि गिरिगे कितन्यो छत्री भारी लाग तहाँ खरिहान ५२ जैसे भेड़िन भेड़हा पैठै जैसे अहिर बिडारै गाय ॥ तैसे मलखे के मुर्चा में कोउ राजपूत न रोके पायँ ५३ सूरज ठाकुर तहँ पाछे सों कम्मरपकरिलीन फिरिआय ॥ बहुतक छत्री यकमिल हैकै बन्धन फेरि लीन करवाय ५४ त्यालिया खंदक में गजराजा फिरि मलखे को दीन डराय ॥ हाल पायकै फुलिया मालिनि बेटी पास पहुंची जाय ५५ कही हकीकत सब मलखे की मालिनि बार बार तहँ गाय ॥ सुनिसुनिबातें तहँ मालिनिकी बेटी बार बार पछिताय ५६ तुम्हें विधाता अस चहिये ना जैसी कीन हमारे साथ ॥ बड़े दयालू औ बरदाता हमपर कृपाकरो रघुनाथ ५७ फिरि फिरि बिनवै रघुनन्दनको धरिकै भूमि आपनो माथ ॥ कैसे देखैं हम बालम को मालिनि फेरिकहौ यहगाथ ५८ सुनिकै बातें गजमोतिनिकी मालिनिकही कथा समुझाय ॥ दिवस बीतिगा इन बातन में संध्याकाल पहुंचा आय ५६ थार मँगायो तब चाँदी का भोजन सबै लीन धरवाय ॥ चाँदी केरे फिरि लोटा में निर्मल पानी लीन भराय ६० पाँच पान को बीरा लैके रेशम रस्सी लीन मँगाय ॥
२० आल्हखण्ड । १७५ कीन तयारी त्यहि खंदक को जहँपर परा बनाफरराय ६१ आधी रातिके फिरि अमला में बेटी अटी तहाँ पर जाय ॥ रेशम रस्सी को लटकायो औयह बोली बचन सुनाय ६२ बप्पा हमरे वैरी ह्वैगे तुमका खंदक दीन डराय ॥ अब चढ़िआवो गहि रस्सीको बालम बार बार बलिजायँ ६३ सुनिकै बातैं गजमोतिनिकी बोला मोहबेका सरदार ॥ घटिहा राजाकी बेटी हौ तुम्हरो कौन करै इतवार ६४ किरिया करिकै म्वहिं लै आयो औ खंदक में दियो डराय ॥ बातैं सुनिकै मलखाने की बेटी बोली शीश नवाय ६५ मोहिं शपथ है रघुनन्दन की मानो सत्य बचन तुम नाथ ॥ क्वारी रहिहौं मैं दुनिया में की फिरि ब्याहहोय तुमसाथ ६६ सुनिकै बातैं गजमोतिनि की मलखे बोले बचन उदार ॥ धर्म क्षत्तिरिन को मिटिजावै जो हम बचैं नारि उपकार ६७ चोरी चोरा हम निकरैं ना ओ गजमोतिनि बातबनाय ॥ हमको चाहौ जो ठकुराइनि लश्कर खबरिदेउ पहुँचाय ६८ तुमचलिजावोनिजमहलनको बीती अर्द्धरात अब आय ॥ इतना सुनिकै बेटी चलिभै महलन सोयगई फिरिजाय ६६ भोर भये यह आया आल्हा फिरिमालिनिको लीनबुलाय ॥ लिखिकै चिट्ठी बघऊदन को मालिनि हाथ दीन पंकराय ७० मालिनि बोली गजमोतिनिसों बेटी बार बार बलिजायँ ॥ जो सुधिपाई गजराजा कहुँ हमरे जाय प्राणपर आय ७१ बेटी बोली तब फुलिया ते मालिनि सत्य देयँ बतलाय ॥ पर उपकारी जो मरिजावै पहुँचे रामधाम में जाय ७२ इक दिन मरनो है आखिरको ताको कौन सोच है माय ॥
[Header] मलखानका बिवाह । १७७ २१
डोला जाई जब मोहवे को तुमको द्रव्य देउँ अधिकाय ७३ इतना सुनिकै मालिनि चलिभै फाटक ऊपर पहुँची आय ॥ सूरज बेटा गजराजा को द्वारे ठाढ़रहै सो भाय ७४ सो हँसि बोला तहँ मालिनि सों मालिनि कहाँ चली तू धाय ॥ मालिनि बोली तहँ सूरज सों बेटा फूल लेन को जायँ ७५ मोहिं पठायो गजमोतिनि है तुम सों सत्य दीन बतलाय ॥ सूरज बोला दरवानिन सों याकी लेउ तलाशी भाय ७६ सुनिकै बातें ये सूरज की नंगाझोरी लीन कराय ॥ चिट्ठी खोंसे सो जूरा में ताको पता मिला नहिं भाय ७७ मालिनि चलिभै फिरि आगेको फौजन पास पहुँची जाय ॥ जहँ जनवासा था आल्हा का मालिनिअटी तहांपर आय ७८ मालिनि पूछ्यो तहँ माहिलसों कहँ पर बैठ उदयसिंहराय ॥ माहिल पूछ्यो तहँ मालिनिसों आपन हाल देय बतलाय ७९ नाम हमारो उदयसिंह है आई कौन काज तू धाय ॥ सुनिकै बातें ये माहिल की मालिनि कथागई सबगाय ८० सुनिकै बातें सब मालिनिकी माहिल चाबुक लीन उठाय ॥ पीटन लाग्यो सो मालिनिको औ यह कह्योबचनसमुझाय ८१ जल्दी जावै घर अपने को अब ना कहे कथा अस गाय ॥ बड़े जोर सों मालिनि रोई पहुँचा उदयसिंह तब आय ८२ पूछी हकीकति उदयसिंह तब मालिनि कथागई फिरिगाय ॥ मोहिं पठायो गजमोतिनिहै चिट्ठी हाथ दीन पकराय ८३ पढ़तै चिट्ठी बघऊदन के आँखन बही आँसुकी धार ॥ डाटन लाग्यो फिरि माहिलको का तुम कीनवहौ अपकार ८४ सुनिकै बातें बघऊदन की बोला उरई का सरदार ॥ १२
२२ आल्हखण्ड । १७८ हाल बिसेने जो सुनि पावैं तो यहि डरैं जानसों मार ८५ हल्ला करिकै यह बोलतभै तब हम कहा याहि समुझाय ॥ धीरे बोलै जनवासे में नहिं कहुँ सुनी बिसेनोराय ८६ इतना सुनतै मुहँ मटकायो गारी दियो बनाफरराय ॥ ढोलक नारिन औ शूदन की तुमसों कथा कहौं मैं गाय ८७ जैसे पीटे ढोलक बाजै नारी दशा स्वई है भाय ॥ गगरीदाना शूद उताना यहहू मिला खूब ह्याँ आय ८८ भला तुम्हारो हम नित चाहैं साँची सुनो बनाफरराय ॥ जैसे मैने म्वर ब्रह्मा हैं तैसे तुम्हूँ लहुरवा भाय ८६ घाटि न जानैं हम ब्रह्मा ते कैसी कहौ उदयसिंहराय ॥ इतना सुनिकै ऊदन चलिभे सँगमेंमालिनिलीन लिवाय ६० जहाँ पर बैठे थे आल्हाजी ऊदन तहाँ पहुँचे जाय ॥ कही हकीकति तहँ मालिनिने ऊदन पाती दीन सुनाय ६१ बड़ा शोचभा सुनि आल्हाके मनमें वार वार पछितायँ ॥ हमहीं पठवा था मलखे को तबचलिगयो लहुरवाभाय ६२ दिह्यो अशर्फी बहु मालिनिको कीन्ह्यो बिदा बनाफरराय ॥ मालिनि चलिभै जनवासेते पहुँची फेरि महलमें जाय ६३ कह्योहकीकति गजमोतिनिते ऊदन बोले शीश नवाय ॥ हुकुम जो पावैं हम दादा को तौ मलखे को लवैं छुड़ाय ६४ बातैं सुनिकै ये ऊदन की आल्हा हुकुम दीन फर्माय ॥ हुकुम लगायो फिरि ऊदन ने डङ्का तुरत दीन बजवाय ६५ बाजे डङ्का अहतङ्का के सबियाँ फौज भई तय्यार ॥ हथी चढ़ैया हाथिन चढ़िगे बाँके घोड़न भे असवार ६६ पहिल नगाड़ा में जिनबंदी दुसरे बांधि लीन हथियार ॥
मलखानका बिवाह । १७६ २३
तिसर नगाड़ा के बाजतखन चलिभे सबै शूर सरदार ९७ कूच करायो पथरीगढ़ते भुन्नागढ़ै पहुँचे जाय ॥ गा हरिकारा पथरीगढ़ते राजै खबरि दीन बतलाय ९८ सुनिकै बातें हरिकारा की सूरज बेटा लीन बुलाय ॥ काँतामल औ मानसिंह सों राजा कह्यो खूब समुझाय ९९ जितने आये हैं मोहबेते सो बिन घाव एक ना जायँ ॥ बिदा माँगिकै सो राजा सों डङ्का तुरत दीन बजवाय १०० झीलमबख्तर पहिरि सिपाहीन हाथम लीन ढाल तलवार ॥ रणकी मोहरि बाजन लागी रणका होनलाग ब्यवहार १०१ कूच करायो भुन्नागढ़ सों पहुँचे समरभूमि मैदान ॥ ढोल औ तुरही बाजन लागीं घूमनलागे लालनिशान १०२ इतसों आगे सूरज ठाकुर उतसों बेंदुलको असवार ॥ सूरज ठाकुर के देखत खन ऊदन गरु दीन ललकार १०३ छलिकै लैकै मलखाने को औ खन्दक में दीन डराय ॥ बिना बिहाये हम जैहैं ना बहुतन धजी २ उड़िजाय १०४ इतना सुनिकै सूरज जरिगे अपनो घोड़ा दीन बढ़ाय ॥ औ ललकारा उदयसिंह को अब तुम खबरदार है जाय १०५ वार हमारी सों बचिहैना ऊदन मोहबे के सरदार ॥ इतना कहिकै सूरज ठाकुर जल्दी खैंचिलीन तलवार १०६ ऐंचिकै मारा बघऊदन को ऊदन लीन्ह्यो वार बचाय ॥ मानसिंह औ फिरि देबाका परिगा समर बरोबरि आय १०७ सूँदि लपेटा हाथी भिड़िगे अंकुश भिड़े महौतन केर ॥ हौदा हौदा यकमिल हैगे मारैं एक एक को हेर १०८ गोली ओलासम वर्षन भईं कहूँ कहूँ कड़ाबीनकी मार ॥
२४ आल्हखण्ड । १८० तेगा घमकैं बर्दवान के कोताखानी चलै कटार १०९ बड़ी लड़ाई भै भुन्नागढ़ ऊदन सूरज के मैदान ॥ फिरि फिरि मारैं औ ललकारैं नाहर एक एक को ज्वान ११० मानसिंह जगनिक को राजा देवा मैनपुरी चौहान ॥ काँतामल्ल औ बनरसवाला भारी कीन घोर घमसान १११ तीनि सिरोही सूरज मारी ऊदन लीन्ही वार बचाय ॥ साँम उठाई बघऊदनने औ सूरजपर दई चलाय ११२ भागा घोड़ा तब सूरजको लश्कर भागि गयो भयखाय ॥ जहां कचहरी गजराजाकी सूरज तहां पहुँचा जाय ११३ हाथ जोरि औ पायन परिकै राजै बहुत कहा समझाय ॥ बड़े लड़ैया मोहवे वाले तिनकीमारु सही ना जाय११४ सुनिकै बातें ये सूरज की सेमा भगतिनि लीन बुलाय ॥ कही हकीकति सब सेमाते राजा बार बार समझाय ११५ सेमाभगतिनि सूरज लै कै तुरतै कूचदीन करवाय ॥ कूच कराये भुन्नागढ़ ते पथरीगढ़ै पहुँची आय ११६ दीख्यो ऊदन जब सूरज को धावा तुरत दीन करवाय ॥ सेमा बरसी तब जादूको पत्थर सबै फौज है जाय ११७ इकलो देवा बचि लश्करगा आल्हा पास पहुँचा आय ॥ कही हकीकति सब सेमाकी आल्हागये सनाकाखाय ११८ धीरज धरिकै आल्हा बोले देवा नगर मोहोबे जाय ॥ जल्दी लावो तुम इन्द्ल को तासों कह्यो कथासमझाय ११९ इतना सुनिकै देवाठाकुर अपने घोड़ भयो असवार ॥ सातरोज को धावा करिकै पहुँचा नगर मोहोबा द्वार १२० आल्हा केरे फिरि मंदिर में देवा अटा तुरतही जाय ॥
मलखानका विवाह । १८१ २५ कही हकीकति सब सुनवाँसों इन्दल फेरि पहुँचा आय १२१ इन्दल बोल्यो तहँ देबाते चाचा हाल देउ समुझाय ॥ कैसी गुजरी पधरीगढ़ में कस तुम गयो अकेले आय १२२ सुनिकै बातें ये इन्दल की देबा लीन दुःखकी श्वास ॥ सेमाभगतिनि पधरीगढ़ की त्यहिकरिडराबंशकीनाश १२३ तुम्हें बुलैबे को आये हैं बेटा चलौ हमारे साथ ॥ इतना सुनिकै इन्दल चलिभे देबी जाय नवायो माथ १२४ बड़ी अस्तुती की देबी की इन्दल तंत्रशास्त्र अनुसार ॥ अमृतसानी भइ मठवानी इन्दल आल्हा केर कुमार १२५ सवैया ॥ बैठुमठी कछु देर कुमार अबार नहीं करिहउँ मैं काजा। या कहिकै गय देबि तहाँ जहँ बैठ सुराधिप सोहत राजा॥ जायबिनै बहुभांति कियो सुरराज लख्यो तहँ देबिअकाजा। लैकर अमृत देतजबै ललिते मठिमें फिरि होत अवाजा १२६ छिपिकै चलिबे त्येरेसाथ में इन्दल करो तयारी जाय ॥ इतना सुनिकै इन्दल चलिभे देबी बार बार शिरनाय १२७ माता केरे फिरि मंदिर में इन्दल बिनय सुनाई आय ॥ आज्ञा पावैं महतारी कै दादा पास पहुँचैं जायँ १२८ सुनवाँ बोली फिरि इन्दलते बेटा बार बार बलिजायँ ॥ सेमा भगतिनि के देखैको हमहूं चलब पूत तहँधाय १२६ बिस्मय कीन्ह्यो कछु मनमें ना पक्षीरूप धरी तब माय ॥ चूम्यो चाट्यो बदनलगायो पाछे हुकुम दियो फर्माय १३० आज्ञापितुकी सब कोउ कीन्ह्यो राम औ परशुराम लों जानु ॥ जल्दी जावो पितु दर्शन को बेटा कही हमारी मानु १३१