आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमलखानका बिवाह । १७३ १७ धर्म व्यवस्था जहँ परिजावै तहँ सब करैं कहैं हम गाय २५ बातैं सुनिकै ये माहिल की राजा बड़ा कीन सतकार ॥ हमरे नीके के साथी हौ राजा उरई के सरदार २६ माहिलचलिभे फिरितम्बुनको राजै नेगी लीन बुलाय ॥ लैके तोड़ा दो रुपियन के औ नौ हीरा लीन उठाय २७ चलिभे राजा भुन्नागढ़ सों पथरीगढ़ै पहुंचे आय ॥ तहँपर पहुँचे त्यहि तम्बुन में जहँपर रहें बनाफरराय २८ जो कछु सामा लैके गेते आल्है नजरि दीन सो जाय ॥ देखिकै सामा महराजा की हर्षित भये बनाफरराय २६ ऊदन बोले फिरि राजा सों काहे किह्यो परिश्रम आय॥ तब गजराजा बोलन लागे मानो कही लहुरवाभाय ३० देश हमारे की रीती यह परचव लेयँ प्रथमही आय ॥ जहर पठावैं ते शर्वत में देखे बिना पियैं जे भाय ३१ बिना बुद्धिके ते नर कहिये उनके निकट कबौं ना जायँ ॥ पास परीक्षा तुमको जान्यो लरिकाभागिगयो भयखाय३२ पै जो पीवन आल्हा शर्बत सूरज तुरत देत बतलाय ॥ कछु छल नाहीं हम कीन्होरहै लरिकाभागिगयो भयखाय ३३ इकलो लड़का यहिसमयामें माड़ोतरे चलै हर्षाय ॥ भाँवरि होवैं त्यहि लड़का की हाथ न छुवै लोह कछुभाय ३४ सुनिकै बातें ये राजा की मलखे कहा बचन मुसुकाय ॥ छल की सानी सब बातें हैं घातैं सबै परैं दिखलाय ३५ इतना सुनिकै आल्हा बोले मानों कही विसेनेराय ॥ किरिया करिल्यो श्रीगंगा की तौ बर तुरत देयें पठवाय ३६ गङ्गा कीन्ही गजराजा ने औ यह कहा बचन परमान ॥