आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९६ आल्हखण्ड । १७२ संग न देवै जो राजा का तौ हनिमरै काढ़ि तलवार १३ । ऐसे दीनन के मारे ते ऊदन जावै धर्म नशाय ॥ बड़ी कठिनता नर परिजावै औ परिजायँ जानपर आय १४ 'ललिते दशरथ त्यहिसमयामाँ प्राणै दीन धर्म पर आय ॥ तैसे ऊदन कहा मानिकै धर्मै राखु दया पर आय १५ दया राखिकै इन नेगिन को सुखसों देव घरे पहुँचाय ॥ बड़ी दीनता इन नेगिन की सबकर गये प्राणघट आय १६ ऊदन ऐसे केहरि सम्मुख लरिकै कौन शूरमाँ जाय ॥ किह्यो बड़ाई बड़ भाई की आल्हा धर्म दीन समुझाय १७ ऊदन छाँड़यो तब नेगिन को नेगी घरे पहुंचे आय ॥ हाल बतायो गजराजा को सुनतै गयो सनाकाखाय १८ लिल्ली घोड़ी पर चढ़ बैठ्यो माहिल उरई को सरदार ॥ जायकै पहुँच्यो मुन्नागढ़माँ जहँपर भरी लाग दर्बार १६ बड़ी खातिरी भै माहिल कै राजा पास लीन बैठाय ॥ माहिल बोले वहि समया में ओ महराजा बात बनाय २० शर्बत खन्दक में डारागा सबकै कुशल भई यहि ठाएँ ॥ लड़े बनाफर ते जितिहौ ना तुमते सत्य दीन बतलाय २१ अब चलि जावो यहि समयामें आल्हा निकट तुरत महराज ॥ हाथ जोरिकै पाँयन परिकै कीन्ह्योअवाशि आपनोकाज२१ बली भयेपर छल करिये ना निर्बल भये छलौ सों काज ॥ होय हँसौवा कन्या बेहे औ नहिं रहै जगतमें लाज २३ ऐसे समया में महराजा करिये कौन दूसरो साज ॥ छली न बाजैं हम दुनियाँ में औ रहिजाय हमारी लाज २४ छल बल राजाका कर्मै है कर्म न होय प्रजनकर भाय ॥