भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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१८ आल्हखण्ड । १७४ छल जो राखैं तुम्हरे सँग में तौ म्वहिं सजायैं भगवान ३७ बातैं सुनिकै ये राजा की आल्हा कहा सुनो मलखान ॥ बैठि पालकी में अब जावो तुम्हरो भलो करैं भगवान ३८ सुनिकै बातैं ये आल्हा की मलखे सुमिरि दुर्गामाय ॥ तुरत पालकी में चढ़ि बैठे महरन पलकी लीन उठाय ३६ चारि घरी के फिरि अर्सा में महलन तुरत पहुँचे आय ॥ उतरि पालकी ते मलखाने मड़ये तरे पहुँचे जाय ४० फाटक बन्दी गजराजा करि क्षत्री सबै लीन बुलवाय ॥ रीति बिवाहे की जस चाही तैसे खंभ गड़ा तहँ भाय ४१ गाफिल दीख्यो मलखाने को बन्धन तुरत लीन करवाय ॥ बाँधिकै खंभा में मलखे को हरियर बांस लीन कटवाय ४२ मारन लागे मलखाने को जामा टूक टूक है जाय ॥ देखि तमाशा फुलियामालिनि महलन गई तड़ाका धाय ४३ खबरि सुनाई गजमोतिनि को जो कुछ कियो बिसेनेराय ॥ सुनि गजमोतिनि तहँ ते धाई कोठे ऊपर पहुंची आय ४४ नीचे दीख्यो त्यहि दुलहाको कङ्कण रहा हाथ दर्शाय ॥ तब गजराजा सों गजमोतिनि बोली आरत वचन सुनाय ४५ कहाँ को बँधुवा यहु आयो है जो अति सहै बाँस के घाय ॥ तुरतै छाँड़ो यहि बँधुवा को मोसों बिपतिदीखिनाजाय ४६ तब गजराजा कह बेटी सों खेलो सखिन साथ तुम जाय ॥ पैसा मारयो यहि ठाकुर ने तासों सहै बाँसके घाय ४७ मलखे दीख्यो तब कोठे को चारों नैन एक द्वैजायँ ॥ धरिकै हुमक्यो मलखाने ने खंभा उखरि गयो त्यहिठायँ ४८ बन्धन ढीलेभे मलखे के खंभा लीन हाथ तब भाय ॥