आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८ आल्हाखण्ड । १६४ बेटी तुम्हरी गजमोतिनि का टीका चढ़ा मोहोबे जाय ॥ जाति बनाफर की हीनी है जानौं भलीभांति तुमभाय ७० पानी पीहै को घर तुम्हरे आपन धर्म गँवैहै आय ॥ अबै न बिगरा कछु राजा है साँचे हाल दीन बतलाय ७१ सुनिकै बातें ये माहिल की राजा गयो सनाकाखाय ॥ तबलों सूरज अटा कचहरी राजै शीश नवायो आय ७२ राजा बोल्यो फिरि सूरजते टीका कहाँ चढ़ायो जाय ॥ दोउ कर जोरे सूरज बोले दादा सत्य देउँ बतलाय ७३ दिल्लीकनउज हम फिरि आयन टीका क्यहुन लीन महिपाल ॥ मोहबे उरई के अन्दर में मिलिगे देशराज के लाल ७४ लै बरजोरी गे मोहबे को टीका चढ़ा वीर मलखान ॥ जो कछु रारिकरत मोहबे में दादा जात प्रान पर आन ७५ माघ शुक्ल तेरसिको अइहैं यह सच साइतिका परमान ॥ मारब ब्याहब जो कछु कहिहौं उतनै घनै भई है हान ७६ जितना टीका में दै आये लाये आपन प्राण बचाय ॥ साम दाम अरु दण्ड भेद सों कीन्हे काज तहांपर जाय ७७ सुनिकै बातें ये सूरज की राजै पास लीन बैठाय ॥ फिरि शिरसूंघ्यो गजराजा ने लीन्ह्यो तुरतै गले लगाय ७८ राजा बोल्यो फिरि माहिल ते ठाकुर उरई के सरदार ॥ ब्याहन अइहैं जब हमरे घर तबहीं चली तुरत तलवार ७६ ब्याह न होई गजमोतिनि का तुमते साँच दीन बतलाय ॥ बिदा मांगिकै फिरि राजासों माहिल चले बड़ा सुखपाय ८० माघ महीना आवन लाग्यो धावन लगे मोहोबे दूत ॥ लिखिलिखिचिट्ठी परिमालिकने न्यवतन हेत पठावा दूत ८१