आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४ आल्हाखण्ड । १७० करौं तरंग यहाँ सों पूरण तव पद सुमिरि भवानीकन्त ॥ को यशगावै शिवशंकर को जिनको वेद न पावैं अन्त १४० इति श्रीलखनऊनिवासि ( सी, आई, ई ) मुंशीनवलकिशोरात्मज बाबूप्रयागना- Rayanjiकी आज्ञानुसारउन्नामप्रदेशान्तर्गतपूँदरीकलांनिवासिमिश्रवंशोद्भवबुध कृपाशंकरसूनु पं० ललिताप्रसादकृत मलखानविवाहविषय वर्णनोनामप्रथमस्तरंगः ॥ १ ॥ सवैया ॥ दीननके मन मीनन को मेघवा है वरषत हौ नितवारी। होय भिखारि चहौ नरनारि किये प्रभुआश सदा सुखकारी ॥ दीन पुकार विभीषणकी सुनि आप हर्यो विपदासबहारी ॥ कौन सो दीन रहा शरणागत जो न भयो ललिते हितकारी १ सुमिरन ॥ धन्य बखानों मैं नारद को कीन्ह्यो बड़ा जगत उपकार ॥ शिक्षा देते नहिं दुष्टन को तौ कस धरत राम अवतार १ जो रघुनन्दन जग होते ना तौ यहचरित करत को भाय ॥ 'काह बखानत तुलसी कलियुग कैसे जात जगत यशछाय २ कृष्ण न होते जो द्वापर में कैसे सूर जात भवपार ॥ कोधों मारत शिशुपालै को कोधों करत कंस सों रार ३ कैसे अर्जुन भारत जीतत कैसे करत युधिष्ठिर राज ॥ कौन सो दुनिया में ऐसो भो जैसे भये कृष्ण महराज ४ छूटि सुमिरनी गै देवनकै - शाका सुनो शूरमन क्यार ॥ माहिल अइहैं उरई वाले जहँ गजराज केर दरबार ५ अथ कथाप्रसंग ॥ गा जब रूपन बनि द्वारे पर माहिल आयगयो ततकाल ॥