आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२० आल्हखण्ड । १७५ कीन तयारी त्यहि खंदक को जहँपर परा बनाफरराय ६१ आधी रातिके फिरि अमला में बेटी अटी तहाँ पर जाय ॥ रेशम रस्सी को लटकायो औयह बोली बचन सुनाय ६२ बप्पा हमरे वैरी ह्वैगे तुमका खंदक दीन डराय ॥ अब चढ़िआवो गहि रस्सीको बालम बार बार बलिजायँ ६३ सुनिकै बातैं गजमोतिनिकी बोला मोहबेका सरदार ॥ घटिहा राजाकी बेटी हौ तुम्हरो कौन करै इतवार ६४ किरिया करिकै म्वहिं लै आयो औ खंदक में दियो डराय ॥ बातैं सुनिकै मलखाने की बेटी बोली शीश नवाय ६५ मोहिं शपथ है रघुनन्दन की मानो सत्य बचन तुम नाथ ॥ क्वारी रहिहौं मैं दुनिया में की फिरि ब्याहहोय तुमसाथ ६६ सुनिकै बातैं गजमोतिनि की मलखे बोले बचन उदार ॥ धर्म क्षत्तिरिन को मिटिजावै जो हम बचैं नारि उपकार ६७ चोरी चोरा हम निकरैं ना ओ गजमोतिनि बातबनाय ॥ हमको चाहौ जो ठकुराइनि लश्कर खबरिदेउ पहुँचाय ६८ तुमचलिजावोनिजमहलनको बीती अर्द्धरात अब आय ॥ इतना सुनिकै बेटी चलिभै महलन सोयगई फिरिजाय ६६ भोर भये यह आया आल्हा फिरिमालिनिको लीनबुलाय ॥ लिखिकै चिट्ठी बघऊदन को मालिनि हाथ दीन पंकराय ७० मालिनि बोली गजमोतिनिसों बेटी बार बार बलिजायँ ॥ जो सुधिपाई गजराजा कहुँ हमरे जाय प्राणपर आय ७१ बेटी बोली तब फुलिया ते मालिनि सत्य देयँ बतलाय ॥ पर उपकारी जो मरिजावै पहुँचे रामधाम में जाय ७२ इक दिन मरनो है आखिरको ताको कौन सोच है माय ॥