आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमलखानका बिवाह । १६७ १३ तिमर नगाड़ाके बाजत खन क्षत्रिन कूच दीन करवाय ॥ बाजे डंका अहलंका के बंका चले शूर समुदाय १०६ मारु मारुकै मौहरि बाजै बाजै हाव हाव करनाल ॥ खर खर खर खर कै रथ दौरे रब्बाचले पवनकी चाल १०७ लक्ष पताका यकमिल हैगे नभमाँ गई लालरी छाय ॥ धूरि उड़ानी हय टापन सों बाबा सूरज गये छिपाय १०८ ब्याकुल हैकै पक्षी भागे जंगल जीव गये थर्राय ॥ चलीं बरातें मलखाने की हमरे बूत कहीं ना जाय १०६ सात रोजकी मैजलि करिकै पहुँचे तुरत धुरेपर आय ॥ तम्बू गड़िगे महराजन के झंडा सरग फरहरा खायँ ११० सजिगा तम्बू तहँ आल्हा का भारी लाग खूब दरबार ॥ चूड़ामणि पण्डित तहँ आयौ साइति लाग्योकरनबिचार १११ साइति नीकी अब आई है ऐपनवारी देउ पठाय ॥ हाथ जोरिकै रूपन बोला नेगी कौन तहाँ को जाय ११२ हम नहिं जैहैं पथरी गढ़को सांची सुनो बनाफरराय ॥ बातें सुनिकै ये रूपन की बोलातुरत ललुरवा भाय ११३ घोड़ी कबूतरी दादावाली रूपन चढ़ो ताहिपर जाय ॥ बानाराखे रजपूती का कैसे बने जनाना भाय ११४ सवैया ॥ प्राण न प्यार करें रणशूर कहैं ललिते हम सत्य विचारी । सोनकोधारि झमा झमकारि सो जातसदा पियसेजमें नारी ॥ पाय निशा चमकै तहँ नारि सो रारिकिये चमकै तलवारी । शेरिकिये यश शूरने होत सो कूरनकी अपकीरति भारी १६५