आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२ आल्हखण्ड । १६८ सुनिकै बातें ये ऊदनकी रूपन बहुतगयो शर्म्याय ॥ घोड़ी कबुतरी पर चढ़ि बैठ्यो ऐपनवारी लीन उठाय ११६ माथ नायकै सब क्षत्रिन को मनियादेव हृदय सों ध्याय ॥ चारिघरी के फिरि अरसा माँ फाटक ऊपर पहूँचा आय ११७ हुकुम दर्ररै हुकुम दर्ररै साहेबजादे बात बनाय ॥ कहाँते आये औ कहँ जैहै आपन काम देय बतलाय ११८ सुनिकै बातें दरबानी की बोला घोड़ी का असवार ॥ नगर मोहोबा जगमें जाहिर नामी मोहबे के सरदार ११९ ब्याहन मलखे को आयन हैं मानो साची कही हमार ॥ ऐपनवारी बारी लायो बोलो ठाढ़ो राज दुवार १२० नेग आपने को झगरत है भारी नेग चहै कछुदार ॥ नेग आपनो का तुमचाहौ बोलो घोड़ी के असवार १२१ घोड़ी जोड़ी लैके जाई डांड़े परे तासु भर्त्तार ॥ बोलु गवाँरे अब ऐसे ना द्वारे चहौं चलै तलवार १२२ सुनिकै बातें ये रूपन की चक्रुत द्वारपाल भा द्वार ॥ फिरि २ देखै दिशि रूपन के फिरि २ लावै शोच बिचार १२३ ऐसो बारी हम देखा ना जैसो आयो आज दुवार ॥ सोचि समुझिकै फिरिसो बोला बोलो घोड़े के असवार १२४ गरमी तुम्हरी अब कछु उतरी बोलो नेग काह तुम द्वार ॥ चार घरी भर चलै सिरोही द्वारे बहै रक्त की धार १२५ नेग हमारो यह साँचा है याँचा द्वार तुम्हारे आय ॥ जौन शूरमा हो पथरीगढ़ हमरो नेग देय चुकवाय १२६ ऐसे वैसे हम बारी ना मारी सदा शूर दश पांच ॥ खबरि सुनावै तू राजा का तेरी निकरिपरै कस कांच १२७