भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

पृष्ठ 157, कुल 618 में से

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पृष्ठ 157

३६ आल्हाखण्ड । १५२ भाँवरि तीसरि के परतैखन बिजिया मारी गुर्ज उठाय ॥ वार बचाई त्यहि देवाने राजा रंगमहल को जाय ११५ भाँवरि चौथी के परतैखन राजा जादू दीन चलाय ॥ जवाँ बन्द भै सब कुँवरन कै सबकी नजरबन्द है जाय ११६ सुनवाँ सोची अपने मनमाँ बैरी हैगा बाप हमार ॥ बीर महम्मद की पुरिया को सुनवाँछोड़िदीनत्यहिबार ११७ भई लड़ाई तहँ जादुनकी सातों भाँवरि लई कराय ॥ आल्हा वाली फिरि पलकी में तुरतै सुनवाँ लीन विठाय ११८ सवैया ॥ भूप दुवार चली तलवार अपार बही तहँ शोणित धारा। वीर बली मलखान सुजान तहाँ बहु क्षत्रिनको हनिडारा ॥ पूतजुझार महाहुशियार लड़ै तहँ भीषम केर कुमारा । कौनकहै बघऊदनको रिपुसूदनसों ललिते त्यहि बारा ११९ सुन्दरखन को अरिनन्दन जो सोऊ आयगयो त्यहि द्वार ॥ आठकोसलों चलै सिरोही नदिया बही रक्त की धार १२० आगे डोलाहै सुनवाँ को पीछे होय भड़ाभड़ मार ॥ ऊदनमलखे की मारुन में जूझे बड़े बड़े सरदार १२१ आल्हा बँधुवाभे नैनागढ़ जोगा झगा बँधे मलखान ॥ कूच करायो बघऊदन ने लश्कर मागराज नियरान१२२ ऊदन बोले तब सुनवाँ ते भौजी मानों कही हमार ॥ दादा बांधेगे नैनागढ़ कैसी युक्तिकरी यहिवार १२३ सुनिकै बातें बघऊदन की सुनवाँ युक्ति कही समुझाय ॥ सम्मत करिकै दूनों चलिभे नैनागढ़ै पहूंचे आय १२४ पुहपा मालिनि के घर बैठे सुनवाँ सहित लहुरवा भाय ॥

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