भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

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३८ आल्हखण्ड । १५४ हनवन करिके तिरवेनीको दीन्ह्यो द्विजन दान सब ज्वान १३७ बृक्ष अक्षयबटको पूजन करि पहुंचे भरद्वाज अस्थान ॥ बेनीमाधो के दर्शन करि दीन्ह्यो द्विजन सुवरण दान १३८ हाथी घोड़ा रथ कपड़ा औ गहना दीन द्विजन बुलवाय ॥ भये अयाचक सब याचकगण जय जयरहे बनाफर राय १३६ बैठिकै गंगा के तट ऊपर क्षत्रिन हवन कीन हरषाय ॥ स्वाहा स्वाहा बहु द्विज बोलैं कहुँ २ स्वधा स्वधा गाळाय १४० स्वधा औ स्वाहा ते छुट्टी करि विप्रन भोजन दीन कराय ॥ भोजन करिकै सब द्विज तहँते अपने घरनगये सुखपाय १४१ कूच करायो फिरि मलखाने डंका बजत फौज में जाय ॥ देवलि बिरमा द्वारे ठाढ़ीं देखें वाट बनाफरराय १४२ राह निहारैं नित पुत्रन की कबधौं ऐहैं पुत्र हमार ॥ जौन मुसाफिर आवत देखें ताको करें बड़ा सत्कार १४३ हाल न पावैं जब पुत्रन को तब फिरि जावैं घरे निराश ॥ रानी मल्हना महलन ऊपर नितप्रतिकरैमिलनकी आश १४४ तबलों रुपना आगे आयो पाछे फौज पहुंची आय ॥ बड़ी खुशहाली भै मोहबे माँ दौरे सबै नारिनर धाय १४५ मल्हना देवलि बिरमा तीनों पलकी पास पहुँचीं जाय ॥ मियादेवन को पलकी गै पूजनकीन बहुरिया आय १४६ आल्हा मलखे देबा ऊदन अक्षत चन्दन फूल चढ़ाय ॥ मियादेवन की परिकरमा क्षत्रिन सबन कीन हर्षाय १४७ तहँते आये फिरि द्वारे को तुरतै पण्डितन लीन बुलाय ॥ आरति लैके फिरि सोने की तामें चौमुख दिया बराय १४८ चर परछौनी मल्हना कीन्ह्यो भीतर गये बनाफर राय ॥