भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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आल्हाका बिवाह । १४७ ३१ सूँड़ि लपेटा हाथी भिड़िगे ऊपर करैं महावत मार ॥ पैदर पैदर कै बरनी मै औ असवार साथ असवार ५५ जौने हौदा ऊदन ताकैं बेंबुल तहाँ पहुँचै जाय ॥ हनिकै मारैं असवारे को औ हौदा ते देयँ गिराय ५६ अकसर ऊदन के मारुन में काहू धरा धीर ना जाय ॥ पूरन राजा औ जगनाका परिगासमर बरोबरि आय ५७ मलखे जोगा का संगरहै भोगा बेंबुल का असवार ॥ बिजिया ठाकुर देवा ठाकुर दूनों खूब करैं तलवार ५८ अपने अपने सब मुर्चन में क्षत्री नेक न मानैं हार ॥ मलखे जोगा के मुर्चा में होवै कड़ाबीन की मार ५६ ऊदन भोगा के मुर्चा में कोताखानी चलै कटार ॥ बिजिया देवा के मुर्चा में दोऊ हाथ चलै तलवार ६० को गति बरणै जगनायक की पूरन पटना को सरदार ॥ मारु बरोबरि दोऊ करिकै गरुई हाँक देयँ ललकार ६१ बड़ी लड़ाई भै नैनागढ़ नदिया बही रक्त की धार ॥ बहीं लहासैं तहँ क्षत्रिनकी पक्षी मानों ख्यलें नेवार ६२ जाँघ औ बाहू रजपूतन की तामें गोह सरिस उतरायँ ॥ छुरी कटारी मछली मानों ढालैं कछुवा सम दिखरायँ ६३ घोड़ा हींसैं हाथी चिघरैं ठाढ़े ऊंट तहाँ अललायँ ॥ बड़ बड़ राजा उमरायन को रणमास्यारकागमिलिखायँ ६४ जोगा ठाकुर के मुर्चापर गरुई हांक दीन मलखान ॥ सँभरिकै बैठो अब घोड़ापर की अब लौटि जाव घरज्वान ६५ सुनिकै बातें मलखाने की तुरतै खैंचि लीन तलवार ॥ ऐंचिकै मारा मलखाने को मलखे लीन ढालपर वार ६६