भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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३२ आल्हाखण्ड । १४८ ढाल फाटिगै गैंड़ावाली रणमाँ टूटि गिरी तलवार ॥ उतरि कबूतरी ते मलखाने तुरतै बाँधि लीन सरदार ६७ बंधन हैगा जब जोगाका भोगा लीन्ह्यो सांग उठाय ॥ ताकि कै मारा बघऊदन का ऊदन लीन्ह्यो वार बचाय ६८ ऊदन बोले फिरि भोगाते ओ बिसिआने बात बनाय ॥ वार दूसरी अब तुम मारै ठाकुर तोरि आहिराहिजाय ६९ बातें सुनिकै बघऊदन की भोगा भालालीन उठाय ॥ दूनों अँगुरिन भाला तौलै कालीनाग ऐस मन्नाय ७० तारा टूटै आसमानते तौ हिरगास भुईं ना जाय ॥ छूटिग भाला जो अँगुरिनते कम्मर मचा ठनाका आय ७१ बचा दुलरुआ द्यावलिवाला आला देशराज को लाल ॥ ढालकि औझड़ ऊदनमारा भोगा गिरा तहाँ ततकाल ७२ भोगा बँधिगा रणखेतन में विजिया बड़ा लड़ैया ज्वान ॥ अपने मोर्चा में सो हार्यो बांध्यो मैनपुरी चवहान ७३ पूरनराजा जगनायक का मोर्चापरा बरोबरि आय ॥ गुर्ज चलायो पूरन राजा जगना लीन्ह्यो वार बचाय ७४ ऐंड़ा मसक्यो हरनागरके हाथी उपर पहुंचा जाय ॥ खैंचिकै मारा तलवारी को हाथी सूँढ़गिरी अरराय ७५ गिरामहावत तब मस्तकते हाथी बैठिगयो त्यहि ठायँ ॥ बंधन कीन्ह्यो फिरि पूरन को जीतिक डंका दिह्यो बजाय ७६ भगे सिपाही नैनागढ़ के काहू धराधीर ना जाय ॥ बंधन हैगे चारिउ योधा एकते एक बली अधिकाय ७७ जहँना तम्बू रहे आल्हाका तहँना गये सकल सरदार ॥ माहिल बन्धन सबको दीख्यो घोड़ी तुरत भये असवार ७८