आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
पृष्ठ 187, कुल 618 में से
संदर्भ में पढ़ें२६ आल्हखण्ड । १८२ इतना सुनिकै इन्दल चलिभे देबै तुरत जुहारयो जाय ॥ जल्दी चलिये अब दादा ढिग मातै हुकुमदीन फर्माय १३२ इतना सुनिकै देवा ठाकुर अपने घोड़ भयो असवार ॥ घोड़ करिलिया इन्दल बैठे नाहर-आल्हाकेर कुमार १३३ चील्ह रूप द्वै सुनवाँ उड़िगै आधे सरग रही मड़राय ॥ देबी चलिकै फिरि मंदिरते पथरीगढ़ै पहुँचीजाय १३४ देवा इन्दल दोऊ नाहर आल्हा निकट पहूंचेजाय ॥ आल्हा दीख्यो जबइन्दलको तबछातीसौलियो लगाय १३५ आल्हा बोले फिरि इन्दल ते बेटा कही कथा ना जाय ॥ सेमाभगतिनि के कर्तब ते पत्थर भई फौज सब आय १३६ इन्दल बोले फिरि आल्हा ते अब नहिं देरकरो महराज ॥ जल्दी चलिये अब सुन्नागढ़ चलिकैकरियआपनोकाज १३७ इतना सुनिकै आल्हा ठाकुर हाथी उपर भये असवार ॥ घोड़ मनोहरकी पीठीपर ठाकुर मैनपुरी सरदार १३८ चढ़े करिलियाकी पीठीपर इन्दल कूचदीन करवाय ॥ घड़ी अढ़ाई के अरसा माँ पहुँचे समरभूमि में आय १३६ देखिकै फौजैं तहँ पत्थर की इन्दल गयो सनाकाखाय ॥ उतरिकै घोड़ा ते भुइँ आयो बोल्यो देवी शीश नवाय १४० हेअघनाशिनिसवसुखराशिनि नाशिनिबिपतिकेरिसमुदाय॥ चरण शरण में हम तुम्हरी हैं फौजैं देवो मातु जियाय १४१ तब तो देवी पथरीगढ़ में अमृत बूंद दीन बरसाय ॥ अमृत बूंदी के परतैखन फौजैं उठीं तुरत हरषाय १४२ उठा बेंडुला का चढ़वैया इन्दल निकट पहुँचा आय ॥ चूम्यो चाट्यो गरे लगायो पूंछन लाग बनाफरराय १४३