भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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कैसे आयो तुम पथरीगढ़ हम को हाल देउ बतलाय ॥ बातें सुनिकै ये ऊदन की इन्दल यथातथ्य गा गाय १४४ गा हरिकारा पथरीगढ़ ते झुन्नागढ़ै पहुँचा जाय ॥ दीख तमाशा जो फौजन का राजै हाल दीन बतलाय १४५ सुनिकै बातें हरिकारा की सूरजमल का लीन बुलाय ॥ कही हकीकति सब सूरजते जल्दी हुकुमदीनफरमाय १४६ हुकुम पायकै महराजा को डंका तुरत दीन बजवाय ॥ हाथी घोड़ा औ रथ सजिगे पैदर सजे शूर समुदाय १४७ जितनी फौजें रहैं झुन्नागढ़ सबियाँ बेगि भई तय्यार ॥ हथी चढ़ैया हाथी चढ़िगे बांके घोड़न भे असवार १४८ 'रणकी मौहरि बाजन लागी रणका होन लाग ब्यवहार ॥ ढाढ़ी करखा बोलन लागे बिप्रन कीन वेद उच्चार १४६ कूचको डंका बाजन लाग्यो घूमन लाग्यो लाल निशान ॥ फौजै चलिकै झुन्नागढ़ ते पहुँचीं समरभूमि मैदान १५० धूलि देखिकै आसमान में भारी देखि गर्द गुब्बार ॥ बोल्यो फौजन में त्यहि समया ठाकुर बेंदुलको असवार १५१ फौजै आईं गजराजाकी भारी अंधकार गा छाय ॥ जल्दी सजिकै ओ रणबाघो तुमहूं कूच देव करवाय १५२ बातें सुनिकै बघऊदन की सबियाँ फौज भई तय्यार ॥ झीलमबख्तर पहिरि सिपाहिन हाथ म लई ढाल तलवार १५३ पहिल नगाड़ा में जिनबंदी दुसरे फांदि भये असवार ॥ तिसर नगाड़ा के बाजत खन चलिभे सबै शूर सरदार १५४ पहिले मारुइ भई तोपन की दूसरि भई तीरकी मार ॥ तीसरि मारुइ बंदूकन की चौथे चलनलागितलवार १५५