आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८ आल्हाखण्ड। १८४ पांच कदम पर बरछी छूटैं भालन तीन कदम पर मार ॥ कदम कदम पर चलैं कटारी ऊनाचलै बिलाइति क्यार १५६ तेगा धमकैं बर्दवान के कटि कटि गिरैं शूर सरदार ॥ बड़ी लड़ाई दोउ दल कीन्हो नदिया बही रक्तकी धार १५७ सूरज ऊदन फिरि दोउ का परिगा समर बरोबरि आय ॥ दोऊ मारैं दोउ ललकारैं दोऊ लेवैं वार बचाय १५८ को गति बरणै तहँ दोऊकै दोऊ समर धनी सरदार ॥ बैस बरोबरि हैं दोऊ कै दोऊ खूब करैं तलवार १५६ यहु रणरंगी लै असि नंगी जंगी मैनपुरी चौहान ॥ धरि धरि धमकै राजपूतन को देवा बड़ा लड़ैया जवान १६० को गति बरणै कंतामल की हंता क्षत्रिन को सरदार ॥ फिरि फिरि मारै औ ललकारै दोऊ हाथ करै तलवार १६१ सिर्गा घोड़ा की पीढ़ी पर सय्यद बनरस का सरदार ॥ अली अली कहि जैसी दौरै भागैं गली गली सबयार १६२ भली भली कहि ऊदन बोलैं काँपैं थली थली सरदार ॥ हली हली तहँ पृथ्वी डोलै काँपैं डली डली लखिमार १६३ को गति बरणै तहँ सूरज की यहु गजराजा केर कुमार ॥ खैंचि सिरोही ली कम्मर सों ऊदन उपर हनी तलवार १६४ वार बचाई बघऊदन ने आपो दियो तड़ाका मार ॥ परी सिरोही सो घोड़ा के औशिरगिखो तुरतत्यहिबार१६५ उतरि बेंदुलाते सूरज को पकरो उदयसिंह सरदार ॥ बांधिकै मुशकें सूरजमलकी बेंदुल उपर भयो असवार १६६ औ ललकारयो कंतामल को क्षत्री खबरदार है जाय ॥ घाटि बिसेनेने जस कीन्ह्यों तैसी सजा लेउ अबआय १६७