आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमलखानका विवाह । १८५ २५ इतना कहतै बघऊँदन ने औझड़ हना ढालकी जाय ॥ कांतामल घोड़ा ते गिरिगा पकरा तुरत बनाफरराय १६८ बांधिकै मुशकें काँतामल की तम्बू तुरत दीन पहुँचाय ॥ गा हरिकारा तब मुन्नागढ़ राजै खबरि सुनायो जाय १६६ खेत छूटिगा दिननायक सों झंडा गड़ा निशाको आय ॥ तारागण सब चमकन लाग्यो संतन धुनी दीन परचाय १७० माथ नवावों पितु अपने को ध्यावौं तुम्हें भवानीकन्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवो इच्छा यही मोरिभगवन्त १७१ इति श्रीलखनऊनवासि ( सी,आई,ई ) मुंशी नवलकिशोरात्मजबाबू प्रयागना- रायणजीकीआज्ञानुसारउन्नामप्रदेशान्तर्गतपँडरीकलानिवासिमिश्र वंशोद्भवबुधकृपाशङ्करसूनुपण्डितललिताप्रसादकृतऊदनविजय वर्णनौनामाद्वितीयस्तरंगः ॥ २ ॥ सवैया ॥ होत नहीं जपडू तपहू अपने मन में यहही पछतावैं । काम औ क्रोध बढ़ें नितही दुखही दुखसों हम देह बितातैं ॥ शान्ति औ शील दया अरु धर्म बिना इन कौन कहौ सुखपावैं । गावैं सदा रघुनन्दन को गुण बन्दन कै ललिते बर पावैं १' सुमिरन ॥ हम पद ध्यावैं पुरुषोत्तम के नरनारायण शीश नवाय ॥ नर तो जानो तुम अर्जुन को गीतासुना सकल जयहिभाय १ हैं नारायण कृष्णचन्द्र तहँ जिनकासुयश रहाजगआज ॥ को गति बरणै पुरुषोत्तम कै जिनको नाम राम महराज २ कोधौं पैदा फिरि दुनियां मा कोधौं बैठि करै असराज ॥