आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० आल्हखण्ड । १८६ धर्म छत्तिरी के सब पाले कीन्ह्यो रामचन्द्र जस काज ३ काव्य पुरानी बालमीकि की यहही ठीक ठाक परमान ॥ याको देखै जब कोउ मानुष होवैं रामचन्द्र तत्र भान ४ भानै होतै त्यहि प्रानी के आनी मनो पुरबले भाग ॥ भागै द्वैकै सो जागै उर भागै सबै विपति की आग ५ छूटि सुमिरनी मै ह्यांते अब शाका सुनो शूरमन केर ॥ फौजै सजि हैं गजराजा की लड़ि हैं दऊ शूरमा फेर ६ अथ कथाप्रसंग ॥ खबरि पायकै गजराजा ने सेमा भगतिनि लीन बुलाय ॥ सेमा भगतिनि ते गजराजा सबियाँ कथा कह्यो समुझाय १ सुनि अकुलानी सेमाभगतिनि राजै बार बार शिरनाय ॥ आज्ञा देवो मोहिं जाने को मानो कही बिसेनेराय २ राजा बोले फिरि सेमाते आइव यही काज बुलवाय ॥ अब तुम जावो पथरीगढ़ को मारो सबै मोहबिया जाय ३ आज्ञा पावत महाराजा की सेमा अटी भवन में जाय ॥ लैकै पुरिया सब जादू की तुरतै कूच दीन करवाय ४ तुरत पौरिया को बुलवायो राजै हुकुम दीन फर्माय ॥ तुरत नगड़ची को बुलवाओ डंका तुरत देव बजवाय ५ हुकुम पायकै महाराजा को धावन अटा तुरतही जाय ॥ बाजे डंका अहंतका के हाहाकारी शब्द सुनाय ६ जितनी फौजैं गजराजा की सबियाँ बेगि भई तय्यार ॥ हथी चढ़ैया हाथिन चढ़िगे बाँके घोड़न भे असवार ७ घोड़ अगिनिया गजराजाको सोऊ सजा खड़ा तय्यार ॥ सुमिरि भवानी जगदम्बा को राजा फाँदि भयो असवार ८