भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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मलखानका बिवाह । १८७ २१ ढाढ़ी करखा बोलन लागे बिप्रन कीन वेद उघार ॥ रणकी मौहरि बाजन लागी रणका होन लाग व्यवहार ९ खर खर खर खर कै रथ दौरे रब्बा चले पवन की चाल ॥ मारु मारु करि मौहरि बाजी बाजी हाव हाव करनाल १० आगे हलका है हाथिन का पाछे चले जायँ असवार ॥ पैदल क्षत्री त्यहि पाछे सों हाथम लिये नाँगि तलवार ११ सुनि सुनि चोबें तहँ डङ्का की बोला तुरत बनाफरराय ॥ चढ़िकै आवत गजराजा है मानो कही शूर समुदाय १२ सुनिकै बातें बघऊदन की सँभले सबै शूर सरदार ॥ घड़ी न बीती ना दिन गुजरा फौजैं सबै भई तय्यार १३ दोऊ ओरते तोपैं छूटीं मानो प्रलय मेघ घहरान ॥ मारत मारत फिरि तोपन के संगम भये समर मैदान १४ ऊदन राजा सम्मुख हैगे राजा गरू दीन ललकार ॥ मुशकें छोड़ो दुउ पुत्रनकी ऊदन मानो कही हमार १५ लड़िकै बेटी तुम पैहौ ना मरिकै आन धरो अवतार ॥ सुनिकै बातें ये राजा की बोला उदयसिंह सरदार १६ घाटि बिसेने तुम कीन्ही है मलखे खन्दक दिये डराय ॥ बेटी ब्याहो औ फिरि जावो नाहीं गई प्राणपर आय १७ काम बिटेवन तें परिगा है कबहुँ न परा मर्द ते काम ॥ सम्मुख लड़िकै उदयसिंह ते अबहीं जानचहत यमधाम १८ इतना सुनिकै गजराजा ने आपनि ऐंचि लीन तलवार ॥ हनिकै मारा बघऊदन को ऊदन लीन ढालपर वार १६ फिरि ललकारा गजराजा को ठाकुर खबरदार हैंजाय ॥ पहिली कीन्हे दूसरि कैलै क्षत्री तोरि आहि रहिजाय २०