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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 204

ब्रह्माका विवाह । १६६ ३ खयो मिठाई औ मेवा कछु पलँगा सोय रही फिरिजाय ॥ फिकिरि लगाये सो ब्याहे की एका एकी उठी कन्वाय १२ हम नहिं जैहैं अब श्वशुरे को यह कहि रोय उठी चिल्लाय ॥ रानी अगमा तहँ ठाढ़ी थी तुरतै छाती लीन लगाय १३ धीरज दैके माता पूछे बेटी स्वपन दीख का आज ॥ इतना सुनिकै बेटी बोली माता कहतलगै बड़िलाज १४ माता बोली फिरि बेटी सों बेटी सत्य देउ बतलाय ॥ कैसो स्वपना तुम दीख्यो है हमरे धीर धरा ना जाय १५ सुनिकै बातें ये माता की बेटी कहन लागि त्यहि बार ॥ मोहिं बियाहनजन्तु कोउआयो हाथ म लिये ढाल तलवार १६ फिरि बैठायो मोहिं डोला पर अपने घरे लिये सो जाय ॥ ऐसा दीख्यों जब माता मैं तबहीं रोय उठिउँ चिल्लाय १७ इतना कहिकै बेला चलि भै खेलन लागि सखिन के साथ ॥ महलन आये पिरथी राजा रानी गहाजाय तब हाथ १८ स्वपन बतायो सब बेला को सो सुनि लीन पिथौराराय ॥ ब्याहन लायक अब कन्या है बोली बार बार समुझाय १६ रानी अगमा की बातें सुनि बोले पृथीराज महराज ॥ कहे अधीरज तुम होतीहौ रानी कहा न टारौं आज २० इतना कहिकै पिरथी चलिभे औ दरबार पहुंचे आय ॥ ताहर बेटा को बुलवायो चौंड़ा बाम्हन लीन बुलाय २१ कलम दवाइति कागज लैके चिट्ठी लिखन लाग सरदार ॥ शिरी सरखऊ शिरिपत्री करि पाछे आपन राम जुहार २२ पहिलि लड़ाई है द्वारेपर मड़ये कठिन चली तलवार ॥ खान कलेवा लड़िका आई तबहूँ मूड़ कटावब यार २३