आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[Header] ३ आल्हखण्ड । २००
इतनी जुरैति ज्याहिके होवै टीका लेय हमारो सोय ॥ नहीं विधाता की मर्जी ना कन्या व्याह और विधिहोय २४ इतना लिखिकै पृथीराज ने नाई बारी लीन बुलाय ॥ साल दुसाला मोतिन माला चीरा कलँगी लीन मँगाय २५ तिरपन पलकी अस्सी गजरथ उम्दा घोड़ा सवाहजार ॥ धरिकै तोड़ा दो मुहरन का अच्छा थार सूवरण क्यार २६ तीनि लाखको टीका दैकै सबको हाल दीन समुझाय ॥ नगर मोहोवे कोउ जायो ना ओछी जाति बनाफरराय २७ चिट्ठी दीन्ह्यो फिरि ताहर को ताहर चलिभे शीश नवाय ॥ नाई बारी चौंड़ा ताहर फाटक पार पहुंचे आय २८ ताहर बैठे दलगंजन पर चौंड़ा एकदन्त असवार ॥ कूच करायो फिरि दिल्ली ते दूनों चलत भये सरदार २६ आठ रोज को धावा करिकै सुन्नागढ़ै पहुंचे जाय ॥ लड़का खारो गजराजा को पाती तुरत दीन पकराय ३० पढ़िकै चिट्ठी गजराजा ने टीका तुरत दीन लौटार ॥ तहँते पहुँचे फिरि वौरीगढ़ जहँपर रहैं यादवा यार ३१ तिनहुन टीका जब लीन्ह्यो ना नरवर फेरि पहुंचे जाय ॥ नरपति राजा नरवरवाला सोऊ टीका दीन फिराय ३२ गंगाधर बूँदी का राजा त्यहि दरबार गये फिरि धाय ॥ चिट्ठी पढ़िकै सोऊ ठाकुर टीका तुरत दीन लौटाय ३३ ताहर बोले फिरि चौंड़ाते दादा कही हमारी मान ॥ चार महीना घूमत द्वैगे अब हम भये बहुत हैरान ३४ जल्दी चलिये अब उरई को जहँपर बसै महिल परिहार ॥ यह मन भाय गई चौंड़ा के हाथी उपर भयो असवार ३५