भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 209

आल्हाखण्ड । २०४ कउनसो काज अकाज भयो महराज गयउ जहँ लाज गवाँई ॥ सुखको साज समाज करउ रघुराज सदा मम लाज बचाई । घबड़ानको आज न काज कछू हम ब्याहकरैं वछराजदुहाई ७१ सुनिकै बातैं मलखाने की राजा गयो सनाकाखाय । मलखे चलिभे फिरि महलनको मल्हना पास पहुंचे जाय ७२ चिट्ठी पढ़िकै पृथीराज की मलखे हाल दीन बतलाय । सुनिकै चिट्ठी पृथीराज की मल्हनागई तुरत कुँभिलाय ७३ तारा टूटे आसमान में थर थर धरा गई तब हाल । चील्हैं छाईं राजमहल में रोवन लागे श्वान श्रृगाल ७४ मल्हना बोली तब मलखे ते अशकुन बहुत परैं दिखलाय । छारो ब्रह्मा घरमें रहिहै टीका आप देउ लौटाय ७५ सुनिकै बातें ये मल्हना की मलखे बोले वचन रिसाय । ब्याह विधाता यह रचिराखा टीका कौन सकै लौटाय ७६ सदा न फूलै कहुँ वन तोरई माई सदा न सावन होय । सदा जवानी नहिं स्थिरहै माई सदा न वर्षा होय ७७ टीका फेरो जो दिल्ली का माता होउ जगत बदनाम । जातिके ओछे मोहवे वाले यह है देश-देश सरनाम ७८ होय नतैती जो दिल्ली में पूरण होयँ हमारे काम । भुन्ना नैनागढ़ माड़ो में हमपर कृपाकीन सियराम ७९ ये सब अशकुन हैं ताहर को माता कहां ज्ञान गा त्वार । अबै कबूतरी ना बुड्ढी भै ना बल खाय गई तलवार ८० बार जो बाँका जा ब्रह्मा का हमरो मूड़ लियो कटवाय । बातें सुनिकै ये मलखे की मल्हना दीन्ह्यो बाँह गहाय ८१