आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविदा कि विरिया अब आई है यह मोहिं कह्यो चँदेलोराय ६२ यहु संदेशा हम लाये हैं ओ महराज पिथोराराय ॥ जो कछु उत्तर तुम ते पावैं राजै सर्वइ सुनावैं जाय ६३ बातें सुनिकै ये रूपन की बोले पृथीराज महराज ॥ देश हमारे की रीती यह पुरिखन कियो अगारी काज ६४ ब्याह के पीछे गौना देवैं तबहीं होवै पूर विवाह ॥ यहतुम कहियो परिमालिक ते ऐसे कहे बचन नरनाह ६५ धन्य बखानैं हम आल्हा को सातो भाँवरि लियो कराय ॥ हैं सब लायक मलखे ठाकुर हमरो कहौ संदेशो जाय ६६ सुनिकै बातें पृथीराज की रूपन चला तुरत शिरनाय ॥ आयकै पहुँच्यो त्यहि तम्बू में ज्यहि में रहैं चँदेलेराय ६७ आल्हा ऊदन मलखे सुलखे बैठे लिहे ढाल तलवार ॥ जोगा भोगा मन्नागूजर जगनिक भैने चँदेलेक्यार ६८ जो संदेशा पृथीराज का रूपन सो गा सबै सुनाय ॥ सुनिकै बातें पृथीराज की भा मन खुशीं चँदेलोराय ६६ हुकुम लगायो फिरि लश्कर में क्षत्री कूच देयँ करवाय ॥ मानि आज्ञा परिमालिक की आल्हा कूच दीन फरमाय १०० कूच क डंका तब बाजत भो क्षत्री सबै भये हुशियार ॥ हथी चढ़ैया हाथी चढ़िगे बाकी घोड़न भे असवार १०१ बाजे डंका अहलंका के घूमन लागे लाल निशान ॥ बैठि पालकी ब्रह्मा चलि भे साथै चले वीर मलखान १०२ ढोल औ तुरही कै गिनती ना बाजन कीन घोर घमंसान ॥ ग्यारा रोज कि मैजलि करिकै मोहवे आये बराती जवान १०३ आगे चलिकै रूपनबारी मल्हना महल पहुँचा आय ॥