आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआलहखण्ड । २४० लक्ष्मीपति तुमको सब जानत चाहन सरन आपनो काज ॥ भूप युधिष्ठिर की गति देखी वनमाँ रहे छूटिगै राज ४ वस्त्र न देखा जिन देहीमां केवल चढ़ी भस्म सब अङ्ग ॥ रावण बाणासुर को देखा जिन सों जुरी आपसौं जङ्ग ५ छूटि सुमिरनी गै देवन कै औ ऊदन का सुनो विवाह ॥ घोड़ खरीदन काबुल जैहैं पठई मोहवे का नरनाह ६ अथ कथाप्रसङ्ग ॥ एक समैया परिमालिक का भारी लाग राजदरबार ॥ बैठे क्षत्री सब महिफिल हैं एकने एक शूर सरदार १ पारस पत्थर ज्यहि के घरमा लोहा छुये सोन है जाय ॥ कौन बड़ाई तिनकै करिकै शोभा वरणि पार लै जाय २ माहिल शाले परिमालिक के सोऊ गये तहां पर आय ॥ देखि बनाफर उदयसिंह को माहिल पीर भई अधिकाय ३ माहिल बोले तहँ राजा सों मानो कही चँदेलेराय ॥ नाम तुम्हारो देश देश में तुम पर कृपा कीन रघुराय ४ एक बात की अब कमती है सो बिन कहे रहा ना जाये ॥ घोड़ तुम्हारे घर कमती हैं बूढ़े घोड़ भरे अधिकाय ५ रुपिया पैसा की कमती ना थोड़े घोड़ लेउ मँगवाय ॥ आवैं बछेड़ा काबुलवाले तौ फिरि नामहोय अधिकाय ६ इतना सुनिकै राजा बोले काबुल कौन खरीदन जाय ॥ हाथ जोरिकै ऊदन बोले काबुल हमें देउ पठवाय ७ सुनिकै बातैं बघ ऊदन की राजा गये सनाका खाय ॥ बोलि न आवा परिमालिक ते मुहँका विरागयो कुम्हिलाय ८ कलँगी गिरिगे फिरि पगड़ी ते काँपन लाग चँदेलेराय ॥