आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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[Header] उदयसिंहका बिवाह । २४१ ३ रौंवाँ ठाढ़े भे देही के नैनन दीन्ह्यो झरी लगाय ६ माहिल बोले परिमालिक ते काहे सोच कीन अधिकाय ॥ लड़का बाउर ऊदन नाहीं जो तुम डरो चँदेलेराय १० इनसे बढ़िकै को मोहबेमाँ घोड़ा जौन खरीदन जाय ॥ है मर्दाना इनको बाना कालौ लड़े न सम्मुख आय ११ कहिकै पलटत नहिं ऊदन हैं जानो भली भांति महराज ॥ भय नहिं लावो अपने मनमाँ करिहैं सिद्धकाज रघुराज १२ बातें सुनिकै ये माहिलकी बोले फेरि रजापरिमाल ॥ तुम भल जानत हौ ऊदन को कलहा देशराजको लाल १३ रारि मचाई यहु मारग में आई फेरि ब्याधि कछु भाय ॥ बात चलाई तुम ऐसी है जासों सोचभयो अधिकाय १४ सुनिकै बातें परिमालिक की बोला उदयसिंह सरदार ॥ शपथ शारदा शिवशङ्कर की हम काबुल को खड़े तयार १५ भली बताई माहिल मामा राजाकरो बचन बिश्वास ॥ यक अवलम्बा जगदम्बा का सोई पूरि करें सब आश १६ क्षत्री ह्वैकै समरसकावै त्यहि को बार बार धिक्कार ॥ बाँझै होवै सो नारी जग नाहक रखै पेटमें भार १७ बेद यज्ञ औ दान युद्ध ये क्षत्री केर रूप श्रृंगार ॥ ये नहिं होवें ज्यहि क्षत्री के त्यहि को बार बार धिक्कार १८ एक ऋचा गायत्री जानै सोऊ बेद पढ़ैया ज्वान ॥ ब्राह्मण क्षत्री बनिया तीनों यासों विमुख श्वान अनुमान १६ बातें सुनिकै बघऊदन की बोले फेरि रजापरिमाल ॥ कहा न मनिहौ तुम बच्चा अब कलहा देशराज के लाल २० देवा ठाकुर को सँग लैके काबुल घोड़ खरीदो जाय ॥ १६