आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
पृष्ठ 245, कुल 618 में से
संदर्भ में पढ़ें४ आल्हखण्ड । २४२ ररि मचायो कहुँ मारग ना मान्यो कही बनाफरराय २१ इतना कहिकै परिमालिकने फिरि यह हुकुम दीन फरमाय॥ पंद्रह खच्चर मुहरैं लै कै काबुल जाउ लहुरवा भाय २२ सुनिकै बातैं परमालिक की दोऊ हाथ जोरि शिर नाय ॥ बिदा मांगिकै परिमालिकते मल्हना महल पहुँचा जाय २३ कही हकीकति सब मल्हनाते ऊदन बार बार शिरनाय ॥ करतब जान्यो जब माहिलकै मल्हना बारवार पछिताय २४ पै भलजानै अपने मनमाँ मानी नहीं लहुरवाभाय ॥ तासों रोक्यो महरानी ना आशीर्वाद दीन हर्षाय २५ बिदा मांगिकै ऊदन चलिभा दशहरिपुरै पहुँचा जाय ॥ हालबतायो सब माता को ऊदन बार बार समुझाय २६ सुनिकै बातैं बघऊदन की भौजी माता उठीं रिसाय ॥ तुम नहिंजावो अब काबुलको ऊदन काह गये बौराय २७ आल्हा बरज्यो भल ऊदन को नीक न करो लहुरवाभाय ॥ तुम्हें पठावत नहिं राजा हैं तुमहीं कौन हेतु को जाय २८ बातैं सुनिकै ये आल्हा की ऊदन कहा बचन शिरनाय ॥ हम तो जैबै अब काबुल को बहुत न धजी धजी उड़ि जाय २६ हम को बरजो अब भाई ना इतना प्यार करो अधिकाय ॥ बातैं सुनिकै बघऊदन की आल्हा चुप्पसाधि रहि जाय ३० पायँ लागिकै फिरि माता के औ सुनवाँ को शीशनवाय ॥ बिदा मांगिकै बड़माई सों ऊदन कूच दीन करवाय ३१ घोड़ मनोहर देवा बैठा ऊदन बेंदुलपर असवार ॥ बजा काफिला फिरिकाबुलको दोऊ चले शूर सरदार ३२ एक कोस जब नरवर रहिगा ऊदन बोले बचन सुनाय ॥