आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८ आल्हखण्ड । २४६ हाटक निकटै म्वरे द्वारे के सीधा घास लिह्यो मँगवाय ६७ सुनिकै बातैं त्यहि माली के ऊदन कूच दीन करवाय ॥ द्वारे पहुंचे फिरि माली के मेखैं तहाँ दीन गड़वाय ६८ मांगिकै पलँगा माली लायो द्वारे तुरत दीन डरवाय ॥ गद्दा परिगा मखमलवाला आला बैठ बनाफरराय ६६ माली चलिभा फुलवगियाका मालिनि द्वार पहुँची आय ॥ मालिनि बोली उदयसिंह ते ठाकुर हाल देउ बतलाय ७० कहाँ ते आये औ कहँ जैहौ तुम्हरो काह नाम है भाय ॥ बातैं सुनिकै ये मालिनि की बोले तुरत बनाफरराय ७१ नाम हमारो उदयसिंह है हमरो देश मोहोबा जान ॥ छोटे भैया हम आल्हा के साँचे बचन हमारे मान ७२ सुनिकै बातैं ये ऊदन की मालिनि फेरि कहा शिरनाय ॥ आल्हा बेहे कौन शहर में साँची साँची देउ बताय ७३ सुनिकै बातैं ये मालिनि की बोला उदयसिंह सरदार ॥ भैया ब्याहे नैनागढ़ माँ सुनवाँभौजी आय हमार ७४ बड़ी खुशहाली भै मालिनिके बोली हाथ जोरि शिरनाय ॥ हमहूँ सुनवाँ साथै खेलीं हिरिया नाम हमारो भाय ७५ मैको हमरो है नैनागढ़ सुनवाँ बहिनी लगे हमारि ॥ चलिकै बैठो म्वरे मन्दिर में देवर सेवा करों तुम्हारि ७६ बातैं सुनिकै ये हिरिया की भा मन खुशी बनाफरराय ॥ दिह्यो अशर्फी दश मालिनिको औयहबोल्योवचनसुनाय ७७ सीधा लावो तुम लरिकनको भोजन वेगि पकावो जाय ॥ दिना चारि यहि पुरमा रहिकै पाछे कूच देव करवाय ७८ सुनिकै ये ऊदन की मालिनि बैठि धाम में जाय ॥