आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२० आल्हखण्ड । कोऊ तहॉ नलकी पलकी सजि सुन्दर तापर सेज लगावैं । गावैं कहाँलों कवीललिते फलिते रघुनाथके जे गुणगावैं ७५ बन्दन करिकै श्रीगणेश को दशरथ नन्दन हृदय मनाय ॥ तब हम गावैं फिरि आल्हाको जामें काज सिद्धि है जाय ७६ सजा रिसाला घोड़नवाला लगभग तीसलाख अनुमान ॥ पन्द्रहलाख सजे हाथी तहँ पैंतिसलाख सिपाही ज्वान ७७ साजि सजि तोपैं अष्टधातु की सोऊ होन लगीं तय्यार ॥ बैल नहायेंगे तोपन में गाड़िन गोला भरे अपार ७८ हथी महावत हाथी लै कै औ पृथ्वीमाँ देयँ बिठाय ॥ धरिकै सीढ़ी साँखूवाली हौदा तिनपर देयँ चढ़ाय ७९ बारह कलशा सोनेवाले ते हौदापर देयँ धराय ॥ डरें अँबारी जिन हाथिन के तिनकीशोभाकही न जाय ८० को गति बरौँ तिन हाथिनकें घण्टा गरे रहे हहराय ॥ छाय अँधेरिया गै दिल्ली में हाथी हाथी परैं दिखाय ८१ अंगद पंगद मकुना भौंरा सोहैं श्वेत वरण गजराज ॥ मैनकुंज मलया धौरागिरि कहूँ दुइदन्ता रहे विराज ८२ सवैया ॥ हाथिन के दल बादलसों नभ छायगयो रजभानु लुकाने । मेरु समान महान सबै जिनके पदभार अहीश सकाने ॥ नाद करें तिन ऊपर वीर अधीर भये सुरराज छिपाने । ललिते गजराज लखेमहराज तबै मनमें अतिही हर्षाने ८३ सजिगे हाथी जब सबियों तहँ घोड़ासजनलागि त्यहिकाल ॥ कोउ कोउ घोड़ा हंस चालपर कोउकोउजात मोरकी चाल ८४ रण की मौहरि बाजन लागी रणका होन लाग व्यवहार ॥