आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंयोगिनिस्वयंम्बर । ९६ चन्दकवीश्वर के मिलने को तुरतै चला चँदेलाराय ६४ जायकै पहुँच्यो त्यहि तम्बू में जहाँ पर बैठ बीर चौहान ॥ चन्दकबीश्वर के आगेधरि कीन्ह्यो बहुतभांतिसनमान ६५ उठा पिथौरा तब आसन ते आयो जहाँ चँदेलाराय ॥ हाथ पकरिकै चन्देले को अपने हाथे दियो चपाय ६६ देखि बीरता पृथुइराज की तब पहिचना कन्नौजीराय ॥ चन्दकबीश्वर को दैकै सब फिरि दरबार पहुँचा आय ६७ हुकुम लगायो निज मन्त्री को बहुतक मल्ल लेउ बुलवाय॥ जाय न पावैं दिल्हीवाले इनका कट्टा देउ करवाय ६८ त्यही समय्या त्यहि अवसरमाँ पृथुइ कूच दीन करवाय ॥ कनउज तेरी उत्तर दिशिमाँ पहुंचे पांच कोसपर जाय ६९ हिरसिंह ठाकुरको तहँते फिरि तुरतै दिल्ही दीन पठाय ॥ साजिकै फौजे चतुरंगिनि को हमको यहाँ मिलौ तुम आय ७० सुनिकै बातें पृथुइराज की हिरसिंह चला तुरत शिरनाय ॥ जायकै पहुँच्यो फिरे दिल्ही में औ सब खबरि सुनाई जाय ७१ सुनिकै बातें सब हिरसिंह की मनमाँ कान्हकुँवर मुसुकाय ॥ हुकुम लगायो निज मन्त्री को पुरमें दौंड़ी दो बजवाय ७२ हुकुम पायकै कान्हकुँवर को पुरमें बजन नगारा लाग ॥ धम् धम् धम् धम् बाजन लाग्यो मानों मेघ गरज्जन लाग ७३ शब्द नगारा का सुनतै खन क्षत्री सबै भये हुशियार ॥ अपने अपने तब चकरनको क्षत्रिन गरू दीन ललकार ७४ सवैया ॥ कोऊ कहैँदल हाथिन लाउ सजाउ बछेड़न को गोहरावैं । कोऊ कहैं रथ बैल सँवारु गँवारु अबे का देर लगावैं ॥