भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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६८ आल्हखण्ड ।

उतरिकै पलकी सों जल्दीसों माला गले दीन पहिराय ५२ बिरा खवायो पृथुइराज को आपन नाम दीन बतलाय ॥ हाथजोरिकै संयोगिनि फिरि बोली आरतवचन सुनाय ५३ देवी देवता हम सब ध्याये ओ महराज पिथौराय ॥ दर्शन तुम्हरे तब हम पाये तुवमन काह देउ बतलाय ५४ बातें सुनिकै संयोगिनि की बोल्यो पृथुइराज महराज ॥ लड़ब चँदेले सों सँगरामरि पद्मिनिजवशितुम्हारेकाज ५५ मानभंग करि चन्देले को डोला लै दिल्ली तब जाउँ ॥ जो अस कनउज माँ करिहौंना तौ नहिं कह्यो पिथौरा नाउँ ५६ धीरज राखो अपने मनमाँ अबतुम लौटि महलको जाउ ॥ पन्द्रह सोलह दिनके भीतर हम तुम होब एकही ठाउँ ५७ बातें सुनिकै महाराजा की तब चरणन में शीश नवाय ॥ बैठि पालकी में संयोगिनि सीता रामचरण पदध्याय ५८ चारि कहरवा मिलि डोला लै महलन तुरत दीन पहुँचाय ॥ गै संयोगिनि जब महलन को पौढ़ी तुरत पलँग पर जाय ५६ खेत छूटिगो दिननायक सों झण्डा गड़ो निशा कोआय ॥ तारागण सब चमकन लागे सन् सन् सनासन गाव्वाय ६० सोय पिथौरा गे तम्बू में महलन सूता चँदेलाराय ॥ पक्षी बोले चौगिर्दाते मुरगन बाँग दीन हर्षाय ६१ जगा चँदेला तब महलन में तम्बू जगा पिथौराराय ॥ प्रातक्रिया करि तब दोनों नृप आपन आपन इष्ट मनाय ६२ बैठ्यो महलन में चन्देला तम्बू बैठ पिथौराराय ॥ अपने मन्त्री को बुलवायो यहु महराज कनौजीराय ६३ सात ढलाला मोतिन् माला हीरा पन्ना लीन मँगाय ॥