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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

पृष्ठ 258, कुल 618 में से

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उदयसिंहका बियाह। २५५ १७ डमरू लीन्ह्यो देवा ठाकुर बंशी उदयसिंह सरदार १३ धुरपद, सोरठ, जैजैवन्ती, गावैं पूरराग कल्यान ॥ टप्पा ठुमरी भजन रेखता तोरैं गजल पर्ज पर तान १४ को गति बरौ तिन योगिनकै एकते एक रूप गुणवान ॥ ड्योढ़ी दाबे दोउ नरपति कै योगी चले तुरत बलवान १५ देखि तमाशा तिन योगिनका मारग भीर भई अधिकाय ॥ ता ता थेई ता ता थेई थेई थेई दीन मचाय १६ बाजै डमरू भल देवा का ऊदन बंशी रहा बजाय ॥ मोर कि नाचन ऊदन नाचै मारग भूलि गये सबभाय १७ मोहीं तिरिया भल नरवर की चढ़िचढ़ि लखैं अटरिन आय ॥ एक एक सों बोलन लागीं जैसे नारिन केर स्वभाव १८ धन्य बखानों इन मातन को जिनकी कोखिलिन अवतार ॥ देखो आली इन योगिन को कैसो रूप दीन करतार १६ ये दोउ बालक क्यहू राजा के बारे लीन योग को धार ॥ सब गुण आगर दोउ नागर हैं योगी कामरूप अवतार २० क्यहू पियासे लरिका घर में भोजन करैं क्यहू भरतार ॥ पै ते भूलीं दोउ योगिन में तन मन केरो नहीं सँभार २१ गावत नाचत दोऊ योगी पहुँचे नरपति के दरबार ॥ बाजा डमरू तहँ देवा का नाचा बेंदुल का असवार २२ कमर झुकावै भाव बतावै गावै देशराज का लाल ॥ देखि तमाशा यहु योगिन का भा मनवड़ा खुशीनरपाल २३ नरपति बोला तब योगिन ने साँचे हाल देउ बतलाय ॥ कहाँ ते आयो औ कहँ जैहौ चाहौ काह लेनको भाय २४ हम तो आये बंगाले ते जावैं हिंगलाज महराज ५

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