आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
पृष्ठ 261, कुल 618 में से
संदर्भ में पढ़ें२० आल्हाखण्ड । २५८ फुलवा बोली तब माताते योगी साँच रहा बतलाय ४६ परिगै छाया जब बाँदी कै तबहीं गिरा मूरछाखाय ॥ ऊदन बोले तब रानी ते ह्याँते जान चहैं हम माय ५० इतना सुनिकै चम्पा बोली योगी मानो कही हमार ॥ भोजन दूसर हम परसावैं योगी जँयलेउ ज्यवनार ५१ देवा बोला तब रानी ते साँचे बचन करो परमान ॥ फिरिकै बैठें हम चौकाना पूरण नियम हमारो जान ५२ ऐसे योगी आगे हैं हैं भोगिहैं भोगस्वादवश आय ॥ तैसे योगी हम नाहीं हैं अपनो डारैं नियम नशाय ५३ योगी हैकै भोगी होवै शोचन योग सोय अधिकाय ॥ इतना कहिकै दोऊ योगी माँगिकै बिदा चले हर्षाय ५४ आयकै पहुँचे मालिनि घरमाँ योगिनबाना धरे उतार ॥ पाग बैंजनी शिरपर बाँधी नाहर उदयसिंह सरदार ५५ ऊदन बोले फिरि देवा ते ठाकुर मैनपुरी चौहान ॥ कई महीना ह्याँपर गुजरे ना अब रहिगा द्रव्यठिकान ५६ घोड़ खरीदन कासों जावैं यहही शोच होय अधिकाय ॥ पै कछु औषधि ह्याँ सूझैना कैसी करी यहांपर भाय ५७ का लै जावैं अब मोहबे को काबुल काह खरीदैं जाय ॥ इतना सुनिकै देवा बोले धीरज धरो लहुरवाभाय ५८ गत नहिंशोधैं कहुँ पण्डितजन मत यह ठीक हृदय ठहराय ॥ कूच करावो अब नरवरते चलिये नगरमोहोबे भाय ५६ यह हम कहिबे परिमालिकते नरवर टिक्यन चँदेलेराय ॥ भूज तुरैलै इनके लागीं ऊदन तहां गये बौराय ६० कछु नहिं आशा तहँ बचनेकी निश्चय गई प्राणपै आय ॥