आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
पृष्ठ 262, कुल 618 में से
संदर्भ में पढ़ेंउदयसिंहका विवाह । २५६ २१ कीन दवाई हम ऊदन की सब धन आये तहाँ गँवाय ६१ यह मन भाई उदयसिंह के तुरतै कूच दीन करवाय ॥ कीरतिसागर के डाँड़े पर पहुंचे फेरि बनाफर आय ६२ उतरि बेंदुला ते भुइँ आये तम्बू तुरत दीन गड़वाय ॥ परिगा पलँगा तहँ ऊदन का लेटे तहाँ बनाफरराय ६३ उबटन लाग्यो भल हल्दी का पीली देह परै दिखराय ॥ भोजन कमती कैदिन खायो तासोंबदनगयो कुम्हिलाय ६४ करिकै सूरति बीमरिहा कै बोला उदयसिंह सरदार ॥ बात बनावो परिमालिक ते तौ रहिजावै धर्म हमार ६५ गंगा कीन्ही हम फुलवा सँग तुम्हरो ब्याह करब ह्याँ आय ॥ टरै प्रतिज्ञा जो क्षत्री कै तौफिरि जहरखाय मरि जाय ६६ मित्र साँकरो फिरि ऐसो अब परिहै बार बार नहिं आय ॥ इतना सुनिकै देवा चलिभा पहुंचा जहाँ चँदेलोराय ६७ सूरति दीख्यो जब देवा की भा मन खुशी रजापरिमाल ॥ हाथ जोरिकै देवा बोल्यो औ ऊदनके कह्यो हवाल ६८ लगीं चुरैलैं नरवरगढ़ में ऊदन हैगे हाल बिहाल ॥ रूपिया पैसा सब खर्चा भे रहिगा कछू नहीं नरपाल ६६ कीरतिसागर तम्बू भीतर ब्याकुल परा लहुरवाभाय ॥ इतना सुनिकै परिमालिक जी तुरतै गये सनाकाखाय ७० लिखिकै पाती आल्हाजी को तुरतै धावन लीन बुलाय ॥ दैके पाती फिरि धावन को बाकी हाल कह्यो समुझाय ७१ लैंकै पाती धावन चलिभा दशहरिपुरै पहूँचा जाय ॥ दीन्ह्यो पाती जब आल्हा को बाँचा आंकु आंकु निरताय ७२ पढ़िकै पाती आल्हा ठाकुर तुरतै हाथी लीन मँगाय ॥