भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

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उदयसिंहका विवाह । २६३ २५ सोंकि समुन्दर चहु महि लेवै बिल्ली लड़ै सिंहसों आय १०६ ये अनहोनी चहु हैव जावै झूठ न कहै लहुरवा भाय ॥ इतना सुनिकै आल्हा बोले अब तू चुपसाधिरहिजाय ११० टरिजा टरिजा री सम्मुख ते काहे बार बार बकाय । ब्याहन जैबे हम नरवर में तहदिल होयँ बनाफरराय १११ इतना सुनिकै सुनवाँ चलि भै आल्हा रूपना लीन बुलाय ॥ लिखिकै चिट्ठी मलखानेको सिरसा तुरतदीन पठवाय ११२ खबरि पायकै मलखे ठाकुर दशहरिपुरै पहुँचे आय । हाथ जोरिकै द्वउ आल्हा के बोले चरण शीश नवाय ११३ काह आज्ञा है दादा कै जो सेवक का लीन बुलाय ॥ सुनिकै बातें मलखाने की आल्हाहाल कहासमुझाय ११४ घोड़ खरीदन गे काबुल को नरवर नैन खरीदनि जाय ॥ बनि बौगहा ऊदन बैठे चलिये ब्याहकरन अबभाय ११५ बड़ी खुशहाली भै मलखे के बोले हाथ जोरि शिरनाय ॥ न्यवत पठावो सब राजन को दादा भली बनी यह आय ११६ इतना सुनिकै आल्ही ठाकुर तुरतै धावन लीन बुलाय ॥ पाती लिखिकै सबराजन को तुरतै न्यवतं दीनपठवाय ११७ यक हरिकारा गा भुन्नागढ़ यक नैनागढ़ दीन पठाय ॥ यक हरिकारा गा बौरीगढ़ दिल्ली एक पहुँचा जाय ११८ उरई कनौउज सिरसा मोहबे सबने न्यवत दीन पठवाय ॥ खबरि पायकै सब राजागण दशहरिपुरै पहूंचे आय ११९ कीनि खातिरी सबके आल्हा डंका तुरत दीन बजवाय ॥ बाजे डंका अहर्तका के हाहाकार शब्दगा छाय १२० ब्यावलिबोली फिरि आल्हा ते मानो कही बनाफरराय ॥