आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ आल्हखण्ड । २६२ यह नहिं भाई मन ऊदन के सुनतै वदन गयो कुम्हिलाय ६७ जब रुख दीख्यो यह ऊदन का सुनवाँ चली महलते धाय ॥ जायकै पहुँची आल्हा ढिगमाँ औ सब हाल कहा समुझाय ६८ सुनिकै बोले आल्हा ठाकुर तिरिया काह गई बौराय ॥ बेढब राजा है नरवर का तहँ शिर कौन कटावै जाय ६६ इतना सुनिकै सुनवाँ बोली क्षत्री पूत बनाफरराय ॥ तुमका बातें ये छाजैं ना कन्ता वार वार बलिजायँ १०० इतना सुनिकै आल्हा बोले तिरिया बिना बुद्धिकी आय ॥ नाहक हिंसा हम करिहैं ना मरिहैं जीवजन्तु अधिकाय १०१ इतना सुनिकै सुनवाँ बोली दोऊ हाथ जोरि शिर नाय ॥ यह नहिं हिंसा है क्षत्री कै कीन्हेनि युद्ध कृष्ण यदुराय १०२ सोलह सहस आठ कन्यन को लड़िकै लीन कृष्ण महराज ॥ तिनकी बहिनी के पति अर्जुन कीन्हेनि युद्ध द्रौपदी काज १०३ धर्म धुरंधर भीषम हैगे लड़िगे काशिराज घर जाय ॥ अम्बा अम्बे अम्बालिका को लाये जीति नृपन समुदाय १०४ पै कछु हिंसा तिन मानी ना जानैं धर्म कर्म अधिकाय ॥ पढ़िकै भूल्यो तुम महराजा की यहि अवसर गयो डेराय १०५ लड़नो मरनो समरभूमि में यहही क्षत्री को बयपार ॥ लहँगा लुगरा हमरो पहिरो अपनी देउ ढाल तलवार १०६ मैं चढ़िजाऊँ नरवरगढ़ को व्याहूं जाय लहुरुवा भाय ॥ किरिया कीन्ही बघऊदन ने भौंरी करब यहाँ पर आय १०७ झूठी किरिया जो ह्वैजैहै तौ मरि जाय जहर को खाय ॥ ऐसो वैसो बघऊदन ना गंगा झूठ उलीचै जाय १०८ उदय दिवाकर हों पश्चिम में चन्दा चहौ रसातल जाय ॥