आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[Header] उदयसिंहका विवाह । २६५ २७ [Body] भये अयाचक सब याचकगण जयजयकार रहे तहँगाय १३३ कूच के डंका बाजन लागे घूमन लागे लाल निशान ॥ बैठे हाथी आल्हा ठाकुर करिकै रामचन्द्रको ध्यान १३४ मलखे सुलखे देवा ब्रह्मा मन्नागूजर भयो तयार ॥ औरो राजा न्योते आये तिनहुन बाँधिलीन हथियार १३५ हथी चढ़ैया हाथिन चढ़िंगे बाँके घोड़न भे असवार ॥ कूच कराय दयो मोहबेते चलिभे सबै शूर सरदार १३६ खर खर खर खर कै रथ दौरे चह चह धुरी रहीं चिल्लाय ॥ चलिभैं फौज दल बादल सों शोभाकही बूत ना जाय १३७ झम्झम्झम्झम् झीलमबोलैं मर्मर होयँ गैंड़की ढाल ॥ मारु मारु कै मौहरि बाजैं बाजैं हाव हाव करनाल १३८ छाय अँधेरिया गै मारग में छिपिगे अन्धकार सों भान ॥ को गति बरौ शहजाद्यन कै एकते एक रूप गुणखान १३६ तेगा लीन्हे बर्दवान के कोता खानी लिहे कटार ॥ यक यक भाला दुइ दुइ बरछी कम्मर परी एक तलवार १४० आठरोज का धावा करिकै नरवर पास गये नगच्याय ॥ पांचकोस जब नरवर रहिगा मलखे डेरा दीन डराय १४१ ऊंची टिकुरिन तम्बू गड़िगे नीचे लागीं खूब बजार ॥ हौदा उतरे तहँ हाथिन के क्षत्रिन छोरिधरा हथियार १४२ जहँना तम्बूहै आल्हा का तहँना लाग खूब दरबार ॥ चूड़ामणि पण्डित तहँ बैठे साइतिलागे करनविचार १४३ ऐपनवारी की साइति है पण्डित कहा सुनो मलखान ॥ मलखे बोले तब रुपना ते हमरे करो बचन परमान १४४ ऐपनवारी बारी लैके नरपति द्वार देउ पहुँचाय ॥