आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८ आल्हखण्ड । २६६ इतना सुनिकै रूपन बोले दोऊहाथजोरिशिरनाय १४५ ऐपनवारी बारी लै कै दूसर जाय आज महराज ॥ नैना भुन्ना औ दिल्ली में कीन्हे हमीं अकेले काज १४६ मूड़ कटावन हम जैबे ना मानो कही वीर मलखान ॥ इतना सुनिकै मलखे बोले ⁃हारीबात कहौ तुम ज्वान १४७ गदका बाना पटा बनेठी अइहैं कौन दिवस ये काज ॥ पहिले मुर्चा तुम्हीं कैकै राख्यो देशदेशमें लाज १४८ उदन वियाहे का रहिहैं ना बतियाँ कहिबे का रहिजायँ ॥ यहु दिनमिलिहैं फिरिकबहूंना तातेसोचिसमझिवतलाय १४६ इतना सुनिकै रूपन बोला ठाकुर सिरसा के सरदार ॥ घोड़ बेंडुला हमको देवो ऊदन केरि देउ तलवार १५० घोड़ बेंडुला को मँगवायो औ दैदीन ढाल तलवार ॥ ऐपनवारी बारी लै कै , बेंडुल ऊपर भयो असवार १५१ ऐंड़ा मसक्यो जब बेंडुलके तुरतै चला हवाकी चाल ॥ राजा नरपति के द्वारेपर रूपनपहुँचिगयोततकाल १५२ द्वारपालने तब ललकार्यो नाहर घोड़े के असवार ॥ कहाँ ते आयो औ कहँ जैहौ कहँ है देश रावरे क्यार १५३ इतना सुनिकै रूपन बोले तुम सुनि लेउ हमारो हाल ॥ देश हमारो नगर मोहोबा जहँपर बसैं रजा परिमाल १५४ छोटो भय्या जो आल्हा को बेटा देशराज को लाल ॥ कारी कन्या जो नरपति कै ब्याहनअयेरजापरिमाल १५५ ऐपनवारी हम लै आये रूपन बारी नाम हमार ॥ खबरि जनावो तुम राजा को बारी खड़ा तुम्हारे द्वार १५६ नेग आपने को झगरत है सो अब पड़े देयँ सरदार ॥